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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القس أنطونيوس فكري

مزمور 119 (118 في الأجبية) - قطعة ج - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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قطعة (ج) الاشتياق لكلمة الله في غربتنا

 

الآيات (17، 18): "احسن إليَّ عبدك فأحيا واحفظ أمرك. اكشف عن عينيّ فأرى عجائب من شريعتك."

أَحْسِنْ إِلَى عَبْدِكَ = طالما أحسن الله إلى داود وأنقذه من أعدائه، بل أعطاه أن يملك. ولكنه يطلب هنا أن يعطيه الله مكافأة هي أن يحفظ وصايا الله. وأن يكشف عن عينيه فيبصر عَجَائِبَ مِنْ شَرِيعَتِكَ. والكاهن القبطي في أثناء قراءة البولس والإبركسيس والكاثوليكون يصلي صلوات سرية في الهيكل ليفتح الله أذهان الشعب ويفهموا الكنوز المختبأة في أقوال الله. وعلينا قبل أن نقرأ في الكتاب المقدس أن نصلي حتى يعطينا الله فهماً. ولذلك تصلي الكنيسة أيضًا أوشية الإنجيل قبل قراءة الإنجيل. المرنم هنا يطلب حياة تقضيها في السهر لدراسة الكتاب وفهمه وتنفيذ ما فيه والفرح بوصاياه. ومن اكتشف لذة الكتاب المقدس يعرف أنه في دراسته للكتاب المقدس يتقابل مع الله وجهاً لوجه، ويسمع صوته، وهكذا نقضي أيام غربتنا في هذه الحياة إلى أن نلتقي يوماً بالله ونراه بعيوننا وإلى الأبد. وحينما نقرأ الكتاب بروح الصلاة يزيل الله الغشاوة التي على عيوننا فنرى ونشبع ونتقوى، كما زالت الغشاوة من على عيني شاول الطرسوسي. فشاول كان دارسا للكتاب لكن دون فهم صحيح فلم يعرف المسيح.

 

آية (19): "غريب أنا في الأرض. لا تخف عني وصاياك."

نحن غرباء هنا، وطننا في السماء، ومهمتنا أن نعبر أرض غربتنا بأسرع ما يمكن، ونحرص أن لا نضل الطريق إلى وطننا. وما يسندنا في رحلة غربتنا كلمة الله، ووصيته تكشف لنا أسرار وطننا الذي نحن متغربين عنه ونشتهيه ولا نراه. بل وصايا الله هي التي تضمن لنا أنه حين تنقضي أيام غربتنا، نصل للسماء وطننا.

 

آية (20): "انسحقت نفسي شوقا إلى أحكامك في كل حين."

هنا نرى الاشتياق الملتهب للتعرف أكثر فأكثر على الوصية وعلى فكر الله من خلال كلمته. هو اشتياق لمعرفة المسيح الذي نراه في مطالعتنا للكتاب المقدس. الإنسان جسد وروح. والجسد يتغذى بالطعام، أما الروح فتتغذى بمعرفة الله، ومعرفة الله تعطينا حياة "هذه هي الحياة الأبدية أن يعرفوك أنت الإله الحقيقي ويسوع المسيح الذي أرسلته" (يو3:17). ودراسة كلمة الله هنا تعطينا هذه المعرفة. لذلك قال الكتاب ليس بالخبز وحده يحيا الإنسان بل بكل كلمة تخرج من فم الله (مت4:4). والاشتياق لكلمة الله هو علامة حياة. المبتدئ في الحياة الروحية ينفر من كلمة الله لأنها تكشف خبايا قلبه، وكلما نما الإنسان في معرفة الله ومحبته يزول هذا النفور بل يفرح بها. وهنا نرى المرنم ينسحق شوقًا= أي يطلب هذا بتذلل. داود قال قبلا في آية (16) أنه يتلذذ بالوصية، لذلك هو يبحث عنها باشتياق.

 

آية (21): "انتهرت المتكبرين الملاعين الضالين عن وصاياك."

St-Takla.org Image: ‘Open my eyes to see wonderful things in your Word. I am but a pilgrim here on earth: how I need a map—and your commands are my chart and guide. I long for your instructions more than I can tell’ (Psalm 119:18-20). - Psalms, Bible illustrations by James Padgett (1931-2009), published by Sweet Media صورة في موقع الأنبا تكلا: "اكشف عن عيني فأرى عجائب من شريعتك. غريب أنا في الأرض. لا تخف عني وصاياك. انسحقت نفسي شوقا إلى أحكامك في كل حين" (المزامير 119: 18-20) - صور سفر المزامير، رسم جيمز بادجيت (1931-2009)، إصدار شركة سويت ميديا

St-Takla.org Image: ‘Open my eyes to see wonderful things in your Word. I am but a pilgrim here on earth: how I need a map—and your commands are my chart and guide. I long for your instructions more than I can tell’ (Psalm 119:18-20). - Psalms, Bible illustrations by James Padgett (1931-2009), published by Sweet Media

صورة في موقع الأنبا تكلا: "اكشف عن عيني فأرى عجائب من شريعتك. غريب أنا في الأرض. لا تخف عني وصاياك. انسحقت نفسي شوقا إلى أحكامك في كل حين" (المزامير 119: 18-20) - صور سفر المزامير، رسم جيمز بادجيت (1931-2009)، إصدار شركة سويت ميديا

اللعنة هي نصيب من يترك وصايا الله ويتبع وصايا الناس أو فلسفاتهم، فهناك من في كبرياء ينكر وجود الله (الوجودية وغيرها) وهناك من في كبرياءه يرفض بعناد أن يسلك بحسب وصايا الله وهؤلاء لن يروا بركة في حياتهم، وراجع (تث15:28- 68). وهؤلاء الْمُتَكَبِّرِونَ هم تلاميذ إبليس المتكبر (إش13:14، 14). انْتَهَرْتَ الْمُتَكَبِّرِينَ = أي الله انتهرهم، وداود كملك له أن ينتهر الأشرار.

  

آية (22): "دحرج عني العار والإهانة لأني حفظت شهاداتك."

هنا نرى كيف ينظر العالم لأولاد الله. فالعالم يكرههم ويضطهدهم ويثير الحروب ضدهم بل والشائعات المغرضة التي تسبب لهم العار. والمرتل يصرخ هنا لله حتى يزيح عنه هذا العار ويظهر الحق، وإن لم يكن هنا على الأرض فليكن في السماء. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). وهناك نظرة أخرى لهذه الآية، أنه بالخطية صرنا في عار وشمتت فينا الشياطين. والآن يا رب لقد حفظت وصاياك فابعد عني هذا العار. وهذا هو ما عمله المسيح بصليبه.

 

الآيات (23، 24): "جلس أيضًا رؤساء تقاولوا عليّ. أما عبدك فيناجي بفرائضك. أيضًا شهاداتك هي لذّتي أهل مشورتي."

أقوياء الأرض والرؤساء إضطهدوا المرتل وتقاولوا عليه وكان هذا سبب ألم له. فكيف يتعزى؟ هو يلجأ لكلمة الله يلهج فيها ويتلذذ بها. وقد يعني بالرؤساء الشياطين الشامتين فيه إذ أخطأ. لذلك يعود ويلهج بفرائض الله. أهل مشورتى = المرنم لا يلجأ لإنسان ليستشيره حينما يقع في ضيقة بل يلجأ لكتاب الله وشرائعه وكلامه ليستشير الله.

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