St-Takla.org  >   pub_Bible-Interpretations  >   Holy-Bible-Tafsir-01-Old-Testament  >   Father-Antonious-Fekry  >   21-Sefr-El-Mazameer
 

شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القمص أنطونيوس فكري

مزمور 77 - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
تفسير سفر مزمور: فهرس المزامير بالرقم | فهرس المزامير حسب الأجبية | مقدمة للبابا شنودة | مقدمة سفر المزامير | مزامير الأجبية | مزمور 1 | مزمور 2 | مزمور 3 | مزمور 4 | مزمور 5 | مزمور 6 | مزمور 7 | مزمور 8 | مزمور 9 | مزمور 10 | مزمور 11 | مزمور 12 | مزمور 13 | مزمور 14 | مزمور 15 | مزمور 16 | مزمور 17 | مزمور 18 | مزمور 19 | مزمور 20 | مزمور 21 | مزمور 22 | مزمور 23 | مزمور 24 | مزمور 25 | مزمور 26 | مزمور 27 | مزمور 28 | مزمور 29 | مزمور 30 | مزمور 31 | مزمور 32 | مزمور 33 | مزمور 34 | مزمور 35 | مزمور 36 | مزمور 37 | مزمور 38 | مزمور 39 | مزمور 40 | مزمور 41 | مزمور 42 | مزمور 43 | مزمور 44 | مزمور 45 | مزمور 46 | مزمور 47 | مزمور 48 | مزمور 49 | مزمور 50 | مزمور 51 | مزمور 52 | مزمور 53 | مزمور 54 | مزمور 55 | مزمور 56 | مزمور 57 | مزمور 58 | مزمور 59 | مزمور 60 | مزمور 61 | مزمور 62 | مزمور 63 | مزمور 64 | مزمور 65 | مزمور 66 | مزمور 67 | مزمور 68 | مزمور 69 | مزمور 70 | مزمور 71 | مزمور 72 | مزمور 73 | مزمور 74 | مزمور 75 | مزمور 76 | مزمور 77 | مزمور 78 | مزمور 79 | مزمور 80 | مزمور 81 | مزمور 82 | مزمور 83 | مزمور 84 | مزمور 85 | مزمور 86 | مزمور 87 | مزمور 88 | مزمور 89 | مزمور 90 | مزمور 91 | مزمور 92 | مزمور 93 | مزمور 94 | مزمور 95 | مزمور 96 | مزمور 97 | مزمور 98 | مزمور 99 | مزمور 100 | مزمور 101 | مزمور 102 | مزمور 103 | مزمور 104 | مزمور 105 | مزمور 106 | مزمور 107 | مزمور 108 | مزمور 109 | مزمور 110 | مزمور 111 | مزمور 112 | مزمور 113 | مزمور 114 | مزمور 115 | مزمور 116 | مزمور 117 | مزمور 118 | مزمور 119 (قطعة: أ - ب - ج - د - هـ - و - ز - ح - ط - ي - ك - ل - م - ن - س - ع - ف - ص - ق - ر - ش - ت) | مزمور 120 | مزمور 121 | مزمور 122 | مزمور 123 | مزمور 124 | مزمور 125 | مزمور 126 | مزمور 127 | مزمور 128 | مزمور 129 | مزمور 130 | مزمور 131 | مزمور 132 | مزمور 133 | مزمور 134 | مزمور 135 | مزمور 136 | مزمور 137 | مزمور 138 | مزمور 139 | مزمور 140 | مزمور 141 | مزمور 142 | مزمور 143 | مزمور 144 | مزمور 145 | مزمور 146 | مزمور 147 | مزمور 148 | مزمور 149 | مزمور 150 | مزمور 151 | ملخص عام لسفر المزامير

نص سفر مزمور: مزمور 1 | مزمور 2 | مزمور 3 | مزمور 4 | مزمور 5 | مزمور 6 | مزمور 7 | مزمور 8 | مزمور 9 | مزمور 10 | مزمور 11 | مزمور 12 | مزمور 13 | مزمور 14 | مزمور 15 | مزمور 16 | مزمور 17 | مزمور 18 | مزمور 19 | مزمور 20 | مزمور 21 | مزمور 22 | مزمور 23 | مزمور 24 | مزمور 25 | مزمور 26 | مزمور 27 | مزمور 28 | مزمور 29 | مزمور 30 | مزمور 31 | مزمور 32 | مزمور 33 | مزمور 34 | مزمور 35 | مزمور 36 | مزمور 37 | مزمور 38 | مزمور 39 | مزمور 40 | مزمور 41 | مزمور 42 | مزمور 43 | مزمور 44 | مزمور 45 | مزمور 46 | مزمور 47 | مزمور 48 | مزمور 49 | مزمور 50 | مزمور 51 | مزمور 52 | مزمور 53 | مزمور 54 | مزمور 55 | مزمور 56 | مزمور 57 | مزمور 58 | مزمور 59 | مزمور 60 | مزمور 61 | مزمور 62 | مزمور 63 | مزمور 64 | مزمور 65 | مزمور 66 | مزمور 67 | مزمور 68 | مزمور 69 | مزمور 70 | مزمور 71 | مزمور 72 | مزمور 73 | مزمور 74 | مزمور 75 | مزمور 76 | مزمور 77 | مزمور 78 | مزمور 79 | مزمور 80 | مزمور 81 | مزمور 82 | مزمور 83 | مزمور 84 | مزمور 85 | مزمور 86 | مزمور 87 | مزمور 88 | مزمور 89 | مزمور 90 | مزمور 91 | مزمور 92 | مزمور 93 | مزمور 94 | مزمور 95 | مزمور 96 | مزمور 97 | مزمور 98 | مزمور 99 | مزمور 100 | مزمور 101 | مزمور 102 | مزمور 103 | مزمور 104 | مزمور 105 | مزمور 106 | مزمور 107 | مزمور 108 | مزمور 109 | مزمور 110 | مزمور 111 | مزمور 112 | مزمور 113 | مزمور 114 | مزمور 115 | مزمور 116 | مزمور 117 | مزمور 118 | مزمور 119 | مزمور 120 | مزمور 121 | مزمور 122 | مزمور 123 | مزمور 124 | مزمور 125 | مزمور 126 | مزمور 127 | مزمور 128 | مزمور 129 | مزمور 130 | مزمور 131 | مزمور 132 | مزمور 133 | مزمور 134 | مزمور 135 | مزمور 136 | مزمور 137 | مزمور 138 | مزمور 139 | مزمور 140 | مزمور 141 | مزمور 142 | مزمور 143 | مزمور 144 | مزمور 145 | مزمور 146 | مزمور 147 | مزمور 148 | مزمور 149 | مزمور 150 | مزمور 151 | المزامير كامل

الكتاب المقدس المسموع: استمع لهذا الأصحاح

← اذهب مباشرةً لتفسير الآية: 1 - 2 - 3 - 4 - 5 - 6 - 7 - 8 - 9 - 10 - 11 - 12 - 13 - 14 - 15 - 16 - 17 - 18 - 19

St-Takla.org                     Divider of Saint TaklaHaymanot's website فاصل - موقع الأنبا تكلاهيمانوت

هنا يشكو المرنم من آلام محيطة به، قد تكون آلامه شخصيًا أو آلام عامة لكل الشعب ولا يرى لها حلًا في المستقبل القريب، لذلك يصرخ للرب حتى لا يرفض إلى النهاية. وهو يعزي نفسه بأعمال الله السابقة مع شعبه، وأعمال الله السابقة دائمًا مصدر عزاء.

هناك من يرى أن هذا المزمور كتب إبان فترة السبي، وهناك من يرى أنه كتب في فترة ما قبل يوشيا. والمرنم رأي الآلام التي ستحدث للشعب بسبب خطاياهم فتوجع.

 

الآيات (1-3): "صوتي إلى الله فاصرخ. صوتي إلى الله فأصغي إليّ. في يوم ضيقي التمست الرب. يدي في الليل انبسطت ولم تخدر. أبت نفسي التعزية. اذكر الله فأئنّ. أناجي نفسي فيغشى على روحي. سلاه."

المرنم يستخدم صوته ليصرخ إلى الله، فيشترك جسده (صوته) مع روحه في الصراخ لله، وهو شعر أن الله أصغى لصوته. ونموذج آخر لاشتراك الجسد مع الروح في الصلاة= يدي في الليل أنبسطت فهو منع نفسه من النوم ليصلي رافعًا يديه. والليل أيضًا يشير لوقت التجربة التي يمر بها شعبه. ولم تخدر= لم ترتخ. أبت نفسي التعزية= رفض أن يعطي أذنه لمن يعزيه بأي كلام مطمئن، بل هو في آلامه التجأ للرب مباشرة، ورفض أي تعزية خارجية. اذكر الله فأئن= فهو وحده القادر أن يحول حزني إلى تعزية، ويحول الحالة المحزنة الراهنة إلى حالة مفرحة. فيغشى على روحي= حينما أفكر في المصائب الحالية أو الآتية أكون كالسكران أو كمن يغرق تحت أحماله الثقيلة من الهموم.

 

آية (4): "أمسكت أجفان عيني. انزعجت فلم أتكلم."

من آلامه لم يعد قادرًا على النوم، ومن انزعاجه لم يعد قادرًا حتى على الكلام.

 

الآيات (5-7): "تفكرت في أيام القدم السنين الدهرية. اذكر ترنمي في الليل. مع قلبي أناجي وروحي تبحث.. هل إلى الدهور يرفض الرب ولا يعود للرضا بعد."

هو يقارن بين الحالة الحاضرة وعمل الله العجيب مع شعبه في القديم. أَذْكُرُ تَرَنُّمِي فِي اللَّيْلِ = لقد جعل معاملات الله مع شعبه السابقة محوراً لترنيمه في ضيقته ليلاً وظل يناجي نفسه ويعزي نفسه بأن الله قادر أن يخرج من الجافي حلاوة = أي يخرج الله من الوضع الحالى البائس نجاة. وَرُوحِي تَبْحَثُ. هو يتساءل مع نفسه.. حقاً فالله قادر أن يخرجني من ضيقتي ويخرج شعبنا من ضيقته ولكنه حتى الآن لم يفعل.. فماذا.. هَلْ إِلَى الدُّهُورِ يَرْفُضُ الرَّبُّ.

 

الآيات (8، 9): "هل انتهت إلى الأبد رحمته انقطعت كلمته إلى دور فدور. هل نسي الله رأفة أو قفص برجزه مراحمه. سلاه."

انقطعت كلمته= هل لن يعود الله يرسل كلمته على فم أنبيائه ثانية. قفص برجزه مراحمه = هل الله بسبب غضبه قفص = أغلق باب مراحمه علينا.

 

آية (10): "فقلت هذا ما يعلّني تغيّر يمين العلي."

مَا يُعِلُّنِي = ما يتعبني ويؤلمني. تَغَيُّرُ يَمِينِ الْعَلِيِّ = ترك الله معاملته الحسنة وأتي بالآلام وهنا تعنى كلمة اليمين معاملة الله الحسنة لشعبه وخيراته لهم. وقد تعنى اليمين قوة الله وتغيرها يعنى أن الله سمح بالقوة لأعداء شعبه بدلا من شعبه.

 

الآيات (11، 12): "اذكر أعمال الرب إذ أتذكر عجائبك منذ القدم. والهج بجميع أفعالك وبصنائعك أناجي."

يعود في حيرته وأحساسه بتخلي الله في الوقت الحاضر ليذكر أعماله القديمة.

 

آية (13): "اللهم في القدس طريقك. أي إله عظيم مثل الله."

اللهم في القدس طريقك= تفهم أن الله أعطاهم شريعته في جبل سيناء ومن عند تابوت العهد في قدس الأقداس. وتفهم أنه طالما كان الشعب ملتزمًا بقداسته يلتزم الله برحمته.

 

الآيات (14، 19): "أنت الإله الصانع العجائب. عرفت بين الشعوب قوتك. فككت بذراعك شعبك بني يعقوب ويوسف. سلاه. أبصرتك المياه يا الله. أبصرتك المياه ففزعت ارتعدت أيضًا اللجج. سكبت الغيوم مياها أعطت السحب صوتًا. أيضًا سهامك طارت. صوت رعدك في الزوبعة البروق أضاءت المسكونة. ارتعدت ورجفت الأرض. في البحر طريقك وسبلك في المياه الكثيرة وآثارك لم تعرف."

يذكر هنا أعمال مراحم الله السابقة. فهو حرر شعبه من عبودية فرعون (وهذا عمله المسيح ذراع الرب إذ حررنا من إبليس). بني يعقوب= الذين استعبدهم فرعون. ويوسف= مع أنه كان له منصبًا رفيعًا في مصر إلا أنه طلب من الشعب أنهم في صعودهم يأخذون جسده علامة إيمانه في وعد الله لهم بالرجوع إلى أرض الميعاد. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). وهذا يشير لاشتهائه لأرض الميعاد بالرغم مما وصل إليه من مركز في مصر. وربما أشار بقوله بنى يعقوب (لإسرائيل أي اليهود) وبقوله ويوسف (للأمم فيوسف تعني أن الله يزيد) ثم في (15) يذكر شق البحر أمام الشعب (إشارة للمعمودية). ثم سكبت الغيوم مياهًا= نرى هنا صورة لإزعاج ملاك الرب لمعسكر المصريين، فالمطر إنهال عليهم وصوت الرعد أرعبهم والبروق أصابتهم= وأيضًا سهامك طارت لقد كان الله يستخدم أسلحة الطبيعة ليحارب مع شعبه (خر24:14، 25). والسهام هي الصواعق التي انقضت عليهم. وهذه الآيات تشير أيضًا لانسكاب الروح القدس على الكنيسة (المطر) وكرازة الرسل (السهام) وكلمات الكرازة كانت كالبرق والرعد تنير وتهز القلوب فتؤمن. في البحر طريقك= لقد كنت أنت قائد الشعب في طريقهم في البحر. وأثارك لم تعرف= لم يراك أحد بعينيه ولكن أعمالك كانت ظاهرة في قيادة شعبك. هديت شعبك كالغنم= فالمسيح هو الراعي الصالح. بيد موسى= موسى يرمز للمسيح كملك وهرون= رمز للمسيح كرئيس كهنة.

St-Takla.org                     Divider فاصل - موقع الأنبا تكلاهيمانوت

← تفاسير أصحاحات مزامير: مقدمة | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 | 17 | 18 | 19 | 20 | 21 | 22 | 23 | 24 | 25 | 26 | 27 | 28 | 29 | 30 | 31 | 32 | 33 | 34 | 35 | 36 | 37 | 38 | 39 | 40 | 41 | 42 | 43 | 44 | 45 | 46 | 47 | 48 | 49 | 50 | 51 | 52 | 53 | 54 | 55 | 56 | 57 | 58 | 59 | 60 | 61 | 62 | 63 | 64 | 65 | 66 | 67 | 68 | 69 | 70 | 71 | 72 | 73 | 74 | 75 | 76 | 77 | 78 | 79 | 80 | 81 | 82 | 83 | 84 | 85 | 86 | 87 | 88 | 89 | 90 | 91 | 92 | 93 | 94 | 95 | 96 | 97 | 98 | 99 | 100 | 101 | 102 | 103 | 104 | 105 | 106 | 107 | 108 | 109 | 110 | 111 | 112 | 113 | 114 | 115 | 116 | 117 | 118 | 119 | 120 | 121 | 122 | 123 | 124 | 125 | 126 | 127 | 128 | 129 | 130 | 131 | 132 | 133 | 134 | 135 | 136 | 137 | 138 | 139 | 140 | 141 | 142 | 143 | 144 | 145 | 146 | 147 | 148 | 149 | 150 | 151

الكتاب المقدس المسموع: استمع لهذا الأصحاح


© st-takla.org موقع الأنبا تكلا هيمانوت: بوابة عامة عن عقيدة الكنيسة القبطية الأرثوذكسية، مصر / إيميل:

الكتاب المقدس: بحث، تفاسير | القراءات اليومية | الأجبية | أسئلة | طقس | عقيدة | تاريخ | كتب | شخصيات | كنائس | أديرة | كلمات ترانيم | ميديا | صور | مواقع | اتصل بنا

https://st-takla.org/pub_Bible-Interpretations/Holy-Bible-Tafsir-01-Old-Testament/Father-Antonious-Fekry/21-Sefr-El-Mazameer/Tafseer-Sefr-El-Mazamir__01-Chapter-077.html