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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القس أنطونيوس فكري

مزمور 86 (85 في الأجبية) - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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هو صلاة لداود، وهي صلاة نموذجية نتعلم منها الاتضاع، فهو يقول أنه مسكين وبائس بينما هو الملك العظيم. نشعر في صلاته بأنه في ضيقة، وعلى كل من في ضيقة أن يلجأ لله هكذا وبتواضع. وداود هنا في ضيقته هو رمز للمسيح الذي في أيام جسده صرخ (عب7:5) فاستجابه الرب. وهنا نرى استجابة الرب "وقد نجيت نفسي من الجحيم السفلي. فالمسيح نزل إلى الجحيم من قبل الصليب. وبعد هذا قام ظافرًا على الشيطان والموت. ولذلك نصلي هذا المزمور في الساعة السادسة لنذكر آلام المسيح ونصرته.

 

آية (1): "أمل يا رب أذنك. استجب لي. لأني مسكين وبائس أنا."

أمل يا رب أذنك= تواضع يا رب وأنظر لي أنا الخاطئ، وإقبل صلاتي. أنت يا رب عظيم وجبار، وأنا مسكين وبائس (بسبب خطيتي) فتواضع وإقبل أن تسمعني.

 

آية (2): "احفظ نفسي أني تقي يا إلهي خلص أنت عبدك المتكل عليك."

لأَنِّي تَقِيٌّ = المقصود أنني عبدك المتكل عليك (هذا هو سبب أنني بار) ولست مثل الأشرار الذين يضطهدونني بلا سبب ويتهموننى بأكاذيب أنا بريء منها.

 

الآيات (3، 4): "ارحمني يا رب لأنني أصرخ اليوم كله. فرح نفس عبدك لأنني إليك يا رب أرفع نفسي."

إِلَيْكَ أَصْرُخُ الْيَوْمَ كُلَّهُ = هذه مثل "صلوا بلا انقطاع" (1تس17:5). فالأعداء لن يكفوا عن الحرب ليلاً أو نهاراً. فَرِّحْ نَفْسَ عَبْدِكَ لأَنَّنِي إِلَيْكَ يَا رَبُّ أَرْفَعُ نَفْسِي = كل من يرفع نفسه عن ملذات الدنيا يحصل على فرح روحي.

 

آية (8): "لا مثل لك بين الآلهة يا رب ولا مثل أعمالك."

جدف ربشاقي على الله قائلاً "آلهة الأمم لم تقدر أن تخلص شعوبها فكيف يقدر إلهكم أن يخلصكم من ملك أشور" وفي هذه الليلة أهلك ملاك الرب 185000 من جيش أشور وظهر أن الرب ليس له مثيل في العالم وآلهته. داود هنا لا يعترف بأن هناك آلهة أخرى ولكنه يستعمل اسم آلهة كما تسميها شعوبها. والآن هناك آلهة كثيرة يعبدها الناس، ويظنون أن فيها شبعهم (المال/ الجنس..) ولكن لا مثيل للشبع من شخص المسيح الذي يعطي الماء الحي، أما هذه الآلهة فهي كالماء المالح لا تشبع، بل من يشرب منه يعطش.

 

الآيات (9، 10): "كل الأمم الذين صنعتم يأتون ويسجدون أمامك يا رب ويمجدون اسمك. لأنك عظيم أنت وصانع عجائب. أنت الله وحدك."

نبوة عن دخول الأمم إلى الإيمان. يأتون= باقتراب قلبهم للإيمان. صانع عجائب= العجائب هي تجسد المسيح ومعجزاته وقيامته وصعوده ومحبته العجيبة.

 

آية (11): "علمني يا رب طريقك أسلك في حقك. وحد قلبي لخوف اسمك."

علمني يا رب طريقك= طريق الله هو ترك وتجنب كل المعاصي وملازمة الفضائل ولن نستطيع السلوك في هذا الطريق بدون معونة الله "بدوني لا تقدرون أن تفعلوا شيئًا" (راجع أيضًا يو6:14). (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). وحد قلبي= ليصير قلبي بسيطًا غير منقسم بين محبة الله ومحبة العالم. ورأس الحكمة مخافة الله. فبداية أي طريق يكون بخوف الله.

 

آية (12): "أحمدك يا رب إلهي من كل قلبي وأمجد اسمك إلى الدهر."

حين يتوحد القلب في مخافة الله يصير كله لله فيقدم له الحمد والتمجيد إلى الدهر.

 

آية (13): "لأن رحمتك عظيمة نحوي وقد نجيت نفسي من الهاوية السفلي."

قارن مع (1بط19:3، 20). فالمسيح نزل إلى الجحيم ليخلص من كان فيه موجودًا على الرجاء.

 

الآيات (14-17): "اللهم المتكبرين قد قاموا عليّ وجماعة العتاة طلبوا نفسي ولم يجعلوك أمامهم. أما أنت يا رب فإله رحيم ورؤوف طويل الروح وكثير الرحمة والحق. التفت إليَّ وارحمني. أعط عبدك قوتك وخلص بن أمتك. أصنع معي آية للخير فيرى ذلك مبغضي فيخزوا لأنك أنت يا رب أعنتني وعزيتني."

قد تكون تصويرًا للأعداء المحيطين بداود، أو الأشرار المحيطين بالمسيح يوم الصليب. أو هو إبليس وجنوده حين حاولوا أن يقبضوا على روح المسيح، هؤلاء هم = المتكبرون وجماعة العتاة طلبوا نفسي. ولم يقدروا، بل قبض هو عليهم خلص ابن أمتك= تقال عن المسيح ابن العذراء مريم بالجسد، إذ لم يكن له أب بالجسد. إصنع معي آية للخير= لقد ظهرت آيات كثيرة مع المسيح منذ ولادته من عذراء ثم معجزات وحتى يوم الصليب، أظلمت الشمس وقام من الأموات. ثم بعد الموت ظهرت قوته حقيقة وأمسك بإبليس، إذ كان قد دفع الدين وافتدانا من يده.

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