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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القمص أنطونيوس فكري

مزمور 92 - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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عنوان المزمور أنه تسبحة ليوم السبت، جعل بعض الدارسين يقولون أن داود هو الذي كتبه ليستعمل في أيام السبوت في التسابيح في الهيكل.

يوم السبت هو راحة من العمل وتزداد فيه الصلوات والذبائح والتسابيح ولنلاحظ:

      1.            أيام العمر على الأرض هي أيام عمل (ستة أيام) يعقبها الراحة في الفردوس. ويوم السبت هو إشارة لهذه الراحة من أتعاب الأرض (عب10:4).

      2.            تزداد التسابيح يوم السبت إشارة لأبديتنا التي ستكون كلها أفراح وتسابيح.

      3.            السبت رمز للأحد الذي حصلنا فيه على الراحة الحقيقية من عبودية إبليس والخطية.

 

الآيات (1-3): "حسن هو الحمد للرب والترنم لاسمك أيها العلي. أن يخبر برحمتك في الغداة وأمانتك كل ليلة. على ذات عشرة أوتار وعلى الرباب على عزف العود."

حينما نفهم عمل الله الخلاصي لنا علينا أن نشكره= حسن هو الحمد للرب. وأن نسبحه= الترَنُّمُ لاسمك وأن نخبر الناس بمراحمه= أن يخبر برحمتك. أن نسبحه بحواسنا الداخلية والخارجية= عشرة أوتار. وبكل قوة النفس والجسد والروح= الرباب والعود.

 

الآيات (4-6): "لأنك فرحتني يا رب بصنائعك. بأعمال يديك ابتهج. ما اعظم أعمالك يا رب واعمق جدًا أفكارك. الرجل البليد لا يعرف والجاهل لا يفهم هذا."

ماذا قدم الله لنا لنسبحه؟ فرحتني يا رب بصنائعك= بتجسده وفدائه لنا فأعطانا راحة حقيقية (سبت) وأعطانا خلقة جديدة. ومن أعطاه الله بصيرة سيدرك عظم عمله. أما الذي انشغل بالعالم يفقد إستنارته ويصير بليدًا جاهلًا، لا يرى فيما عمله الله له شيء عجيب يستحق التسبيح، فهو لا يشبع سوى بالماديات= الرجل البليد، الجاهل، لا يعرف ولا يفهم= هذا هو الفاقد حواسه الداخلية. هذا لا يدرك حكمة الله التي أعدت لنا راحة أبدية، بل يعيش يطلب ماديات فانية ويحسد الأشرار الذي حصلوا على هذه الماديات أو الملذات الأرضية.

 

آية (7): " إذا زها الأشرار كالعشب وأزهر كل فاعلي الإثم فلكي يبادوا إلى الدهر."

هنا المرنم يوجه رسالة للجاهل، أن لا يحسد الأشرار على ما حصلوا عليه من ماديات وحسيات، فكل ما في العالم إلى زوال حتى الإنسان وما يملك. ثم يطلب منه أن يوجه نظره إلى الله الأبدي.

 

آية (8): " أما أنت يا رب فمتعال إلى الأبد."

من يعطي حياته للماديات الفانية يصير فانياً مثلها، أما من يتحد بالله المتعالى الأبدي فيرفعه للسماويات ويحيا معه في الراحة إلى الأبد. وقوله متعال هنا هو في مقابل تفاهة كل ما في الأرض.

 

الآيات (9-11): "لأنه هوذا أعداؤك يا رب لأنه هوذا أعداؤك يبيدون. يتبدد كل فاعلي الإثم. وتنصب مثل البقر الوحشي قرني. تدهنت بزيت طري. وتبصر عيني بمراقبيّ. وبالقائمين عليّ بالشر تسمع أذناي."

مرة ثانية المرنم يكرر وبعبارات أخرى أن من يختار طريق الرب ينجح، أما من يختار طريق الشر لا بُد وسينكسر. فأعداء الله يبيدون= لأنهم اختاروا العالم البائد. أما أولاد لله فسيعطيهم قوة= مثل البقر الوحشي. وشباب وحيوية= تدهنت بزيت طري. نجد هنا أن أولاد الله الذين اختاروا الله نصيبًا لهم، لهم قوة ونشاط على مقاومة أعدائهم وغلبتهم. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). وتبصر عيني بمراقبِىَّ= يعطيه الله عينان تبصران كل من يراقبه ليؤذيه. ويعطيه أذنان ليسمع ويعرف القائمين عليه بالشر. أي أن هناك من الأشرار من يقاوم الصديقين، ولكن هذا لا يزعجهم، فهم لهم قوة ضدهم، وهم سوف يعطيهم الله الحواس التي يدركون بها كل مؤامرات الأشرار ضدهم، بل سيدخلون في معارك ضد الأشرار يخرجون منها وقد تجددت حيويتهم ونشاطهم، حين يرون كيف أن الله سيتمجد في هؤلاء الأعداء وتبصر عيني بمراقبِىَّ= سوف أرى كيف أن الله سوف يعاقبهم وسوف أسمع بأعماله العجيبة وذراعه القوية ضدهم وهذا يجدد حيويتي.

 

الآيات (12-15): "الصدّيق كالنخلة يزهو كالأرز في لبنان ينمو. مغروسين في بيت الرب في ديار إلهنا يزهرون. أيضًا يثمرون في الشيبة. يكونون دساما وخضرا. ليخبروا بأن الرب مستقيم. صخرتي هو ولا ظلم فيه."

نرى هنا كيف أن أولاد الله يكونون مثمرين فرحين مزدهرين، نامين اَلصِّدِّيقُ كَالنَّخْلَةِ يَزْهُو = النخلة أطول الأشجار وتنمو مستقيمة. إشارة للحياة السمائية التي يحيا فيها أولاد الله، وحين قال كالنخلة إمتد بصره لما هو أطول من النخلة وقال كَالأَرْزِ فِي لُبْنَانَ يَنْمُو = فأولاد الله في نمو دائم وفي ارتفاع مستمر في اتجاه السماويات. يرفعون أفكارهم عن الأرضيات. والأَرْزِ هو أطول الأشجار وأكثرها عمراً. وحياة الأبرار هي حياة ممتدة إلى الأبدية. والأرز شجر قوي جدًاً إشارة لقوة الأبرار. والنَّخْلَةِ شجرة مثمرة وخضراء دائماً وهكذا أولاد الله، وثمار النخلة ثمار حلوة الطعم. ونقارن مع الأشرار الذين يزهرون كالعشب (آية7) سريعاً ما يقطع ويجف. أما النخل فيعيش طويلاً والشتاء لا يجعله يفقد خضرته. والنخل ينمو ببطء وهكذا أولاد الله ينمون تدريجياً بل قيل عن المسيح أنه كان ينمو. ولأن ثمار النخيل عالية يصعب على الوحوش أن يصلوا لها ويصعب على إبليس أن يصل إلى أولاد الله. ولكن المسيح يحب أن يطلع على نخيل أولاده ليفرح بثمارهم (نش7:7، 8). ويقال أن نواة البلح صلبة إشارة لصلابة إيمان المؤمن. والبلح له ألوان كثيرة إشارة لتعدد ثمار ومواهب المؤمنين، لكن داخل البلحة دائماً أبيض إشارة لنقاوتهم. وأغصان النخيل تستعمل كعلم للذين يغلبون في جهادهم (يو13:12 + رؤ9:7). والأبرار مَغْرُوسِينَ فِي بَيْتِ الرَّبِّ = لا يتركون كنيسته ولاحظ سمات أولاد الله فهم يُثْمِرُونَ فِي الشَّيْبَةِ، فالله يجدد مثل النسر شبابهم. يَكُونُونَ دِسَأمًا = مملوئين ويشبعون غيرهم.

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