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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القمص أنطونيوس فكري

مزمور 48 - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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قد يكون كاتب المزمور هو داود المبتهج بعمل الله وحمايته لمدينته المقدسة أورشليم. وقد يكون كاتب المزمور هو شخص عاش في أيام يهوشافاط أو حزقيا مسبحًا الله على خلاص ونجاة أورشليم فيه يتأمل الكاتب المرنم، كم من أعداء دحرهم الرب على أبواب أورشليم وبقيت هي سالمة. وبالأحرى هو صوت تسبيح شعب الله على حمايته للكنيسة عبر عصور الاستشهاد وفي كل العالم. فمن يقف ليتأمل التاريخ سيرى كم من عصور الاستشهاد قد مرت على الكنيسة، كانت كفيلة بتدميرها، ولكن الله كان معها، بل هو فيها سر مجدها وقوتها.

يسمى المزمور بأنه أحد مزامير صهيون أو الكنيسة، يسبح به لتمجيد الله الممجد في كنيسته التي يسميها المرنم مدينة الملك العظيم. والمسيح أشار لهذا الاسم في (مت35:5) فحضور المسيح فيها هو سر مجدها (1، 2) وأمانها (3-8) وفرحها وتسبيحها وبرها (9-14).

 

الآيات (1، 2): " عظيم هو الرب وحميد جدًا في مدينة إلهنا جبل قدسه. جميل الارتفاع فرح كل الأرض جبل صهيون. فرح أقاصي الشمال مدينة الملك العظيم."

الله وسط كنيسته سر مجدها وهو عظيم وحميد = يحمده كل إنسان على كل أعماله. ولاحظ تسميات الكنيسة هنا فهي مَدِينَةِ إِلهِنَا وهي جَبَلِ قُدْسِهِ وهي جَبَلُ صِهْيَوْنَ وهي مَدِينَةُ الْمَلِكِ الْعَظِيمِ. وقوله جَبَلِ إشارة لأنها سماوية وأنها ثابتة راسخة. وهي مدينة الله فيها نلتقي مع الله في حب وفي عهد وفي علاقة شخصية وهي جَبَلِ قُدْسِهِ فهي تشهد لقداسته خلال ممارستها الحياة المقدسة وشركتها معه. وهي ثابتة كالجبل رغماً عن التجارب التي تحيط بها. وصهيون تعني حصناً فيها نحتمي بالله كسور لنا. وفيها يملك الملك العظيم على قلوب شعبه. ويشعر شعبه بعظمته فيعظموه ويحمدوه. هي جبل عالٍ في معتقداتها وإيمانها المسلَّم مرة للقديسين واحتفظت هي به سليماً. ودعيت مَدِينَةُ فهي تضم كثيرين من كل أنحاء العالم، الله حول قفرها إلى عمار وخرابها إلى مكان يسكن فيه شعبه في أمان والمدن مسوَّرة بأسوار والله هو سور مدينته. وهي جبل ملأ الأرض كلها (حلم الملك نبوخذ نصَّر.. راجع سفر دانيال). جَمِيلُ الارْتِفَاعِ = المرنم يعلن عن جمال الكنيسة وبهائها وعن دورها كبهجة كل الأرض، هي متعالية على الأرضيات ولكن في تواضع ومحبة لمن لا يزال يعيش في الأرضيات، هي تعلن حبها لكل العالم وتخدم الجميع وكمسيحها تبذل نفسها عن الجميع وتكرز بمسيحها في كل مكان. ولأن كرازتها وصلت لكل الأرض صارت فرح كل الأرض. بل فَرَحُ أَقَاصِي الشِّمَالِ = فالكرازة وصلت لكل المسكونة. ولاحظ أن الشمال بالنسبة لليهود كان يعني أشور وبابل واليونان والرومان الذين كانوا أعداءهم الذين أذلوهم. والآن حتى الأعداء صرنا معهم واحداً في الكنيسة. في المسيح صار الأمم واليهود شعباً واحداً.

 

الآيات (3-8): "الله في قصورها يعرف ملجأ. لأنه هوذا الملوك اجتمعوا. مضوا جميعًا. لما رأوا بهتوا ارتاعوا فرّوا. أخذتهم الرعدة هناك. والمخاض كوالدة. بريح شرقية تكسر سفن ترشيش. كما سمعنا هكذا رأينا في مدينة رب الجنود في مدينة إلهنا. الله يثبّتها إلى الأبد. سلاه."

المسيح وسط كنيسته أماناً لها = هو مَلْجَأً.. وحينما اجتمع عليها أعداءها مَضَوْا جَمِيعًا = "شاول شاول لماذا تضطهدني". اَللهُ فِي قُصُورِهَا = حيث يسكن الملك يكون هذا المكان قصراً. والله يسكن في أولاده (يو23:14 + 1كو16:3) هو يسكن فينا فنكون قصر الملك الذي يحميه الملك، ويكون هو ملجأ لنا. والسبعينية ترجمت الآية "الله يُعرف في شرفاتها". (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). فمن خلال حياة أولاده المقدسة يعرف العالم المسيح. وكل قوات الشر تقوم ضد الكنيسة. ويذكر المرنم أن معدات هجومهم سُفُنَ تَرْشِيشَ = أي السفن العظيمة القوية ولكن الله بريحه الجبارة يكسر معداتهم. ترشيش أغنى سواحل البحر. وهناك فاجأهم الْمَخَاضُ كَوَالِدَةٍ= هم اجتمعوا ليتشاوروا ضد الكنيسة ولكن حل عليهم رعب الله فجأة. ولكن بعد المخاض يولد طفل جديد. فمن هؤلاء الأمم يخرج أولاد لله، كما حدث مع الدولة الرومانية فلقد هاجمت بكل قوتها المسيحية، وفاجأها الله بضرباته ليخرج الوليد الجديد، أي الدولة الرومانية المسيحية فمن يقبل تأديب الله بخوف يتحول لإبن لله. ولكن بآلام كالمخاض . كَمَا سَمِعْنَا هكَذَا رَأَيْنَا = لقد سمعنا عن أعمال الله العجيبة مع شعبه في خروجه من مصر ودخوله كنعان. "ويسوع المسيح هو هو أمس واليوم وإلى الأبد". وهو يحمي شعبه دائماً.

 

الآيات (9-14):" ذكرنا يا الله رحمتك في وسط هيكلك. نظير اسمك يا الله تسبيحك إلى أقاصي الأرض. يمينك ملآنة برًا. يفرح جبل صهيون تبتهج بنات يهوذا من أجل أحكامك. طوفوا بصهيون ودوروا حولها. عدوّا أبراجها. ضعوا قلوبكم على متارسها. تأملوا قصورها لكي تحدثوا بها جيلًا آخر. لأن الله هذا هو إلهنا إلى الدهر والأبد. هو يهدينا حتى إلى الموت."

هنا نرى الكنيسة الفرحة بعريسها تسبحه وتعظمه وتذكر أعماله بالتهليل لأنه حفظها وحماها. ونلاحظ أن الضيق لا يفقدها سلامها. نَظِيرُ اسْمِكَ يَا اَللهُ تَسْبِيحُكَ. الاسم يشير لجوهر الإنسان وطبعه. واسم الله يشير لقوته وجبروته وعظمته ومحبته وحمايته لكنيسته. فصلاحك يا رب هو من جوهرك. وأعمالك يا رب وكلها صلاح هي طبيعتك. فأنت يا رب صانع خيرات وهذا طبعك ولهذا نسبحك.. "فلنشكر صانع الخيرات" اذاً نظِيرُ اسْمِكَ = في مقابل كل اعمال مراحمك لكل الشعوب وبقوة وقدرة تَسْبِيحُكَ إِلَى أَقَاصِي الأَرْضِ

عدوا أبراجها = الأبراج العالية التي يقيمها روح الله لكي يختفي فيها المؤمنون ويتحصنون من ضربات العدو. أي إحصوا معاملات الله العجيبة في حماية أولاده وخبروا بها.

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