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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القمص أنطونيوس فكري

مزمور 60 - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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هناك مزامير كثيرة تتكلم عن داود المتألم الذي يصرخ إلى الله ليخلصه. ولكن هذا المزمور كتبه داود في يوم انتصاره، يوم استقر على عرشه، بعد أن أعطاه الله نصرة على الأراميين ثم الأدوميين (يبدو أن الأدوميين استغلوا حرب داود مع أرام وضربوا إسرائيل من الجنوب، فعاد يوآب وضرب أدوم). ورنم داود هذا المزمور مُصَوِّرًا أن الله تخلى عنهم فوقع الشعب في ضيق، ثم نظر إليهم معطيًا قوة فصار أعداءهم في خزي. وكان هذا مثالًا لما حدث مع المسيح، إذ ظن كل واحد أن الله قد تخلى عنه وهو معلق على الصليب، ثم بعد القيامة صار أعداؤه في خزي تحت قدميه.

 

الآيات (1-3): "يا الله رفضتنا أقتحمتنا سخطت. أرجعنا. زلزلت الأرض فصمتها. اجبر كسرها لأنها متزعزعة. أريت شعبك عسرًا. سقيتنا خمر الترنح."

هنا تصوير لحالة الشعب في انكساره، في بداية المعركة وكأن الأرض فُصِمَتْ أي إنشقت ما بين أرام من الشمال وأدوم من الجنوب، وهو يُصوِّرْ أي انكسار للشعب على أنه تخلى من الله عنهم، وهذا صحيح فكل من يتخلى عن الله يتخلى الله عنه فينكسر. ولكن بالنسبة لأولاده، فقد يكون التخلي لفترة قصيرة يعقبها مجد، فداود عاد وانتصر مع شعب إسرائيل هنا علي أعدائهم. وكان هذا رمزًا لما حدث مع المسيح نفسه بعد ذلك.

 

الآيات (4، 5): "أعطيت خائفيك راية ترفع لأجل الحق. سلاه. لكي ينجو أحباؤك. خلّص بيمينك واستجب لي."

أعطيت خائفيك راية= المحاربون يميزون بعضهم بعلامات فكل جيش له راية أو علامة، حتى لا يقتل الزميل زميله. وهنا نجد أن الله هو الذي أعطاهم الراية فهو الذي يحميهم، وهذه الراية هي الإيمان باسمه، واسم الله هو الذي يحميهم. وهم الآن يرون هذه الراية مرفوعة، في صلوات الكهنة في الهيكل وصلوات الجنود في المعركة، في اسم الله الذي يتردد على شفاههم. والراية التي ترفعها الكنيسة الآن هي علامة الصليب، وبها ننجو من سهام إبليس، واسم يسوع المرعب لجنود إبليس.

 

الآيات (6-12): "الله قد تكلم بقدسه. أبتهج اقسم شكيم وأقيس وادي سكوت. لي جلعاد ولي منسّى وافرايم خوذة رأسي يهوذا صولجاني. موآب مرحضتي. على أدوم اطرح نعلي. يا فلسطين اهتفي عليّ. من يقودني إلى المدينة المحصّنة. من يهديني إلى أدوم. أليس أنت يا الله الذي رفضتنا ولا تخرج يا الله مع جيوشنا. اعطنا عونا في الضيق فباطل هو خلاص الإنسان. بالله نصنع ببأس وهو يدوس أعداءنا."

هنا داود يتكلم عن النصرة التي أعطاها الله. فالله قد تكلم بقدسه= أي أعطانا وعده المقدس. وطالما أنه وعد فلأبتهج. والله وعد داود بأن يملك على كل إسرائيل وطالما أن الله وعد فهو سيعطي داود أن تكون له إسرائيل كلها نصيبًا وملكًا له. أقسم شكيم وأقيس وادي سكوت. لي جلعاد.... يهوذا صولجاني= الأسباط كلها صارت له ولن يغتصب أرام أو أدوم شيئًا. لن يقتسم أرام وأدوم الأرض، ولكن كلها لداود وأما أعدائه فلقد أخضعهم الله تحت قدميه (موآب وأدوم) فموآب تصير مهانة كمرحضة وأدوم موطئًا لرجليه. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). وأنت يا فلسطين أن كان لك جرأة اهتفي عليَّ وسيكون مصيرك كهؤلاء. ثم يترنم المرنم ويسبح الله الذي أعاده إلى أورشليم المدينة المحصنة بل أعطاه أن يهزم أدوم ويدوسها ويضرب منها 12,000 في وادي الملح (العنوان). نجد داود هنا يسبح الله وحده الذي يخلص، أما الإنسان فلا يستطيع أن يخلص = باطل هو خلاص الإنسان. ومن الناحية الرمزية. الله قد تكلم بقدسه = الله قد تجسد بالروح القدس من مريم العذراء (عب1:1، 2). وبفدائه اشترى كل عبيده وشعبه واقتسمهم أي صاروا نصيبه (أش12:53). وصار الشيطان تحت أقدامه وأقدام كنيسته (لو19:10). وفي (9) نرى صورة لوحدة الكنيسة بين اليهود والأمم. اليهود هي المدينة المحصنة أورشليم، والأمم هي أدوم. الكنيسة التي كانت قبل المسيح مرفوضة= اليس أنت يا الله الذي رفضتنا. وهو الذي يخلص = فباطل هو خلاص الإنسان.

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