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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القس أنطونيوس فكري

مزمور 66 - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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مزمور شكر وتسبيح، وهكذا تعلمنا الكنيسة أن نشكر دائمًا وفي كل المناسبات.

 

الآيات (1-7): "اهتفي لله يا كل الأرض. رنموا بمجد اسمه. اجعلوا تسبيحه ممجدًا. قولوا لله ما أهيب أعمالك. من عظم قوتك تتملق لك أعداؤك. كل الأرض تسجد لك وترنم لك. ترنم لاسمك. سلاه. هلم انظروا أعمال الله. فعله المرهب نحو بني آدم‏. حول البحر إلى يبس وفي النهر عبروا بالرجل. هناك فرحنا به. متسلط بقوته إلى الدهر. عيناه تراقبان الأمم. المتمردون لا يرفعنّ أنفسهم. سلاه."

المرنم يسبح الله بسبب أعماله العجيبة وسلطانه على كل الطبيعة. اِهْتِفِي = هو صوت فرح الغلبة. رَنِّمُوا بِمَجْدِ اسْمِهِ = إشهدوا وسبحوا اسم الله الذي صنع عجائب بقدرته.

مَا أَهْيَبَ أَعْمَالَكَ = أعمال الله في خلقته عجيبة، ولكن أعجب أعماله التي نمجده ونسبحه عليها، تجسده وفداؤه للبشر. تَتَمَلَّقُ لَكَ أَعْدَاؤُكَ = فالهراطقة مثل الأريوسيين وخلافهم أنكروا لاهوت المسيح ومثلهم الآن شهود يهوه وخلافهم لكنهم مازالوا يتملقون الله ويدعون اسمهم مسيحيين. بل الشياطين صرخوا أمامه "أنا أعرفك من أنت، قدوس الله" (لو34:4). وفي (6) يشير لشق البحر الأحمر أمام موسى ونهر الأردن أمام يشوع. حَوَّلَ الْبَحْرَ إِلَى يَبَسٍ = راجع تفسير (خر14) . عَيْنَاهُ تُرَاقِبَانِ الأُمَمَ = يشتهي خلاصهم ودخولهم إلى الإيمان. ولو فهمنا قوله الأمم علي أنها اشارة لأعداء شعب الله، فالله يراقبهم ويمنعهم من أن يلحقوا شرا بشعبه. ولو فعلوا فهو بسماح منه لتأديب شعبه. ثم يضرب هؤلاء الذين كانوا أداة تأديب لشعبه = فلاَ يَرْفَعُنَ أَنْفُسَهُمْ. كما حدث في سبي بابل وتأديب أشور لإسرائيل أولًا ثم ليهوذا. ولما أتمت أشور تأديب شعب يهوذا، ضرب الملاك منهم 185000 رجل في ليلة واحدة. وماعادت أشور ترفع نفسها علي الله (راجع أقوال ربشاقي ضد الله)

 

الآيات (8-12): "باركوا إلهنا يا أيها الشعوب وسمّعوا صوت تسبيحه. الجاعل أنفسنا في الحياة ولم يسلّم أرجلنا إلى الزلل. لأنك جربتنا يا الله. محصتنا كمحص الفضة. أدخلتنا إلى الشبكة. جعلت ضغطا على متوننا. ركبت أناسا على رؤوسنا. دخلنا في النار والماء ثم أخرجتنا إلى الخصب."

نسبح الرب الْجَاعِلَ أَنْفُسَنَا فِي الْحَيَاةِ = فهو بموته أعطانا حياة. ومن يثبت فيه يُسَلِّمْ أَرْجُلَه من الزَّلَلِ. وفي (10) نجد الله يسمح بالتجارب لينقي أولاده. وهكذا كان الله مع شعبه إسرائيل، فلقد سمح بأن يذلهم بعض الأمم ليتركوا وثنيتهم = أَدْخَلْتَنَا إِلَى الشَّبَكَةِ = سمحت للعدو أن يسبينا. بل كانت يد العدو ثقيلة = جَعَلْتَ ضَغْوطًا عَلَى مُتُونِنَا. فالعدو وضع عليهم أثقال حين سخروهم، والضغوط تشير أيضاً لأحزانهم رَكَّبْتَ أُنَاسًا عَلَى رُؤُوسِنَا = أي سلطتهم علينا. لقد كنا في أيديهم كمن دخل للنار وكاد يحترق، أو دخل للماء وكاد يغرق. ولكنك يا رب أدركتنا وخلصتنا= أَخْرَجْتَنَا إِلَى الْخِصْبِ. وكان هذا لتأديبهم = مَحَصْتَنَا كَمَحْصِ الْفِضَّةِ = دخول الفضة فِي النَّارِ لتنقيتها من الشوائب. والماء يستخدم أيضًا في التطهير . وبعد تنقيتهم وتطهيرهم أصبحت لهم حياة وأثمروا = أَخْرَجْتَنَا إِلَى الْخِصْبِ

 

الآيات (13-15): "ادخل إلى بيتك بمحرقات أوفيك نذوري. التي نطقت بها شفتاي وتكلم بها فمي في ضيقي. اصعد لك محرقات سمينة مع بخور كباش اقدم بقرا مع تيوس. سلاه."

وهو في سبيه نذر أن يقدم نذورًا للرب، وها هو يوفي، ولكن بمفهوم العهد الجديد فالذبائح التي يطلبها الله هي الانسحاق والتسبيح والاهتمام بالفقراء وأن نقدم أجسادنا ذبيحة حيَّة بطاعة الوصية لا الشهوة (عب15:13، 16 + رو1:12 + مز17:51) محرقات سمينة= أي نقدم من أفخر ما عندنا. مع بخور كباش= هذه تعني أما:-

[1] شحوم هذه الذبائح حين يحترق يكون كرائحة بخور ويتنسم الله رائحة الرضا (لا9:1، 13).. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى).

أو [2] البخور يشير لشفاعة المسيح الكفارية التي بدونها لا تقبل كل ذبائحنا وعطايانا. أقدم بقرًا مع تيوس = يقدم أغلى شيء. هو مستعد لأي تكلفة. وهذه الذبائح والتسابيح هي ما أشار إليه سابقا بقوله أخرجتنا إلى الخصب. هذه هي ثمار التطهير.

[3] نلاحظ مع تقديم نوح محرقته قال الكتاب "فتنسم الرب رائحة الرضا" (تك8 : 21) ويقال مع ذبيحة المحرقة "وقود رائحة سرور للرب" (لا1 : 13). فالمحرقة تشير للطاعة الكاملة التي ترمز لطاعة المسيح (فى2 : 8) التي كانت لها رائحة حلوة أمام الله كرائحة البخور. وما يفرح قلب الله في طاعة المسيح أن الآب رأى في المحرقات رجوع أولاده إلى حضنه. فنحن في المسيح نحسب طائعين وكاملين (كو1 : 28). فتعود الخليقة كما أرادها الله منذ البدء في حب متبادل بينها وبين الله. وعلامة حب الله عطاياه، وعلامة حب الخليقة لله طاعتها وخضوعها في ثقة في كلام الله، وهذا عكس ما فعله آدم. وهذا بالضبط ما قاله بولس الرسول عن عمل المسيح (1كو15 : 28).

 

الآيات (16-20): "هلم اسمعوا فأخبركم يا كل الخائفين الله بما صنع لنفسي. صرخت إليه بفمي وتبجيل على لساني. أن راعيت إثما في قلبي لا يستمع لي الرب. لكن قد سمع الله. أصغى إلى صوت صلاتي. مبارك الله الذي لم يبعد صلاتي ولا رحمته عني."

المرنم يريد أن يشرح أعمال الله العجيبة لكل الناس ليسبحوا الله معه. لكنه لا يود أن يلقي درره أمام الخنازير، لذلك يوجه كلامه إلى كل الخائفين الله= وهؤلاء حين يسمعون بما عمل الله سيمجدونه، أما الهراطقة وغير الخائفين فسيهزأون بعمله ونرى هنا شرطًا لاستماع الرب لطلباتنا وهو أن لا نراعي إثمًا في قلوبنا= أي أن يسهر الإنسان ويخطط لإتمام شهوة ما.

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