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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القمص أنطونيوس فكري

مزمور 62 - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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لا يتضح من عنوان المزمور ولا من كلماته، في أي مناسبة قد كتبه داود، إنما هو للتعبير عن الثقة في الله، فالمرنم يقول أنه يثق فيه وينتظره. ويدعو كل من يسمعه أن يفعل مثله.

 

الآيات (1، 2): "إنما للّه انتظرت نفسي. من قبله خلاصي. إنما هو صخرتي وخلاصي ملجأي. لا أتزعزع كثيرًا."

خلاصي.. صخرتي = هي أسماء للمسيح المخلص (لو30:2 + 1كو4:10). لا أتزعزع كثيرًا = من غير الممكن أن لا يتزعزع الإنسان. لكن كلما اقترب الإنسان من الله وقلت خطاياه، قلَّ تزعزعه. وحتى القديس إن تزعزع فهو سريعًا ما يعود لسلامه وثقته في الله.

 

آية (3): "إلى متى تهجمون على الإنسان. تهدمونه كلكم كحائط منقض كجدار واقع."

هنا يشبه الإنسان بحائط منقض والأعداء مجتمعين عليه ليسقطوه. وهذا هو حال الطبيعة البشرية الساقطة، هي مثال حائط هزته صدمة الخطية فمال إلى السقوط، ولا يمكن إعادة بنائه وقيامه إلا بالهدم ثم إعادة البناء (هذا يتم بالمعمودية الآن فنحن نموت وندفن مع المسيح لنقوم ثانية معه في جدة الحياة (رو6) وفيما بعد الموت نقوم بجسد نوراني.

 

آية (4): "إنما يتآمرون ليدفعوه عن شرفه. يرضون بالكذب. بأفواههم يباركون وبقلوبهم يلعنون. سلاه."

نرى هنا صورة لمحاولات الأعداء ضد هذا الجدار ليوقعوه. فهم يتآمرون ليدفعوه عن شرفه= أي يدفعوه ليسقط في الخطية. يرضون بالكذب= هم يغشون ويكذبون كما خدعت الحية حواء بخلطها الكذب بالحقيقة. بأفواههم يباركون= يظهرون للإنسان أنهم أصدقاء محبين ويدعونه للخطية كأنها للترفيه عنه. وبقلوبهم يلعنون= قلوبهم مملوءة كراهية له.

 

الآيات (5-10): "إنما للّه انتظري يا نفسي لأن من قبله رجائي. إنما هو صخرتي وخلاصي ملجأي فلا أتزعزع. على الله خلاصي ومجدي صخرة قوتي محتماي في الله. توكلوا عليه في كل حين يا قوم اسكبوا قدامه قلوبكم. الله ملجأ لنا. سلاه. إنما باطل بنو آدم. كذب بنو البشر. في الموازين هم إلى فوق. هم من باطل أجمعون. لا تتكلوا على الظلم ولا تصيروا باطلا في الخطف. أن زاد الغنى فلا تضعوا عليه قلبًا."

أولاد الله لا يضعوا ثقتهم ورجائهم سوى في الله وحده. أما الإنسان في نظرهم فهو باطل= باطل بنو آدم= وباطل هنا كما في سفر الجامعة أنه شيء مثل السراب لا يمكن أن تثق فيه، فهو اليوم موجود، وغدًا لا تجده، ووعود الإنسان باطلة فكيف نثق في إنسان مهما زاد غناه ومركزه= إن زاد الغنى فلا تضعوا عليه قلبًا. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى).   فكل ما يفتخر به الإنسان من غنى وكرامة ومجد وقوة.. كله فانٍ زائل. ثم يوجه المرنم نصيحة لمن يسمع أن لا يظن أن في الغنى قوة فيسعى للمال بطريق الظلم= لا تصيروا باطلًا في الخطف.

 

الآيات (11، 12): "مرة واحدة تكلم الرب وهاتين الاثنتين سمعت أن العزّة للّه. ولك يا رب الرحمة لأنك أنت تجازي الإنسان كعمله."

مرة واحدة تكلم= أي أن الله كلامه كلام واحد، لا يزيد عليه ولا ينقص منه. وهذين الاثنتين سمعت= سبق وقال أن الله قد تكلم وقضاءه واحد، والمرنم سمع ما قضى به الله وهو أمرين [1] أن العزة لله= هو وحده له القوة وهو وحده يؤدب الخاطئ [2] ولك يا رب الرحمة وقوته تتكامل مع رحمته، وعدله ومحبته ظهرا معًا على الصليب.

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