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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القمص أنطونيوس فكري

مزمور 148 - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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المزامير (148، 149، 150) هي الهوس الرابع من التسبحة اليومية.

المرنم هنا يطلب من كل الخليقة أن تسبح الله. فبالأولى يسبحه الإنسان الذي له هبة النطق.

كيف تسبح الخليقة غير الناطقة إلهها؟ أي أنها في دقة خلقتها وروعة تكوينها وانتظامها تظهر روعة عمل الخالق. فتوالي ظهور الشمس والقمر والنجوم يظهر مقدرة الله الخالق في ضبط الكون. وهذا ما عناه بولس الرسول في (رو19:1-23). وكأن بولس يفسر المعنى في تسبيح الخليقة لله وأن هذا يعني أنها تشهد له. وكن يجب على الإنسان أن يفهم أن وراء هذه الخليقة إلهًا جبارًا قادرًا قديرًا استطاع خلقة وضبط كل الخليقة. فكان عليه أن يسبحه ويؤمن به.

 

الآيات (1، 2): "هَلِّلُويَا. سَبِّحُوا الرَّبَّ مِنَ السَّمَاوَاتِ. سَبِّحُوهُ فِي الأَعَالِي. سَبِّحُوهُ يَا جَمِيعَ مَلاَئِكَتِهِ. سَبِّحُوهُ يَا كُلَّ جُنُودِهِ."

دعوة للملائكة وكل السماويين أن يسبحوا الله. وليس معنى هذا أنهم لا يفعلون ولكن المرنم يقصد أنت يا رب تستحق كل هذا الحب وهذا التسبيح منهم.

 

الآيات (3-6): "سَبِّحِيهِ يَا أَيَّتُهَا الشَّمْسُ وَالْقَمَرُ. سَبِّحِيهِ يَا جَمِيعَ كَوَاكِبِ النُّورِ. سَبِّحِيهِ يَا سَمَاءَ السَّمَاوَاتِ، وَيَا أَيَّتُهَا الْمِيَاهُ الَّتِي فَوْقَ السَّمَاوَاتِ. لِتُسَبِّحِ اسْمَ الرَّبِّ لأَنَّهُ أَمَرَ فَخُلِقَتْ، وَثَبَّتَهَا إِلَى الدَّهْرِ وَالأَبَدِ، وَضَعَ لَهَا حَدًّا فَلَنْ تَتَعَدَّاهُ."

المرنم يطلب أن يسبح الله خليقته السماوية الجامدة كالأفلاك والشمس.. وهذا يعني أنها في انتظامها وجمالها تشهد لله العظيم الذي خلقها ويضبطها في حدود.

 

الآيات (7-10): "سَبِّحِي الرَّبَّ مِنَ الأَرْضِ، يَا أَيَّتُهَا التَّنَانِينُ وَكُلَّ اللُّجَجِ. النَّارُ وَالْبَرَدُ، الثَّلْجُ وَالضَّبَابُ، الرِّيحُ الْعَاصِفَةُ الصَّانِعَةُ كَلِمَتَهُ، الْجِبَالُ وَكُلُّ الآكَامِ، الشَّجَرُ الْمُثْمِرُ وَكُلُّ الأَرْزِ، الْوُحُوشُ وَكُلُّ الْبَهَائِمِ، الدَّبَّابَاتُ وَالطُّيُورُ ذَوَاتُ الأَجْنِحَةِ،"

المرنم يطلب للخليقة الحيوانية أن تسبحه، فهو يعتني بها ويعولها. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). ومجرد بقائها شاهد على قدرة الله في عنايته بكل جنس حيواني في السماء أو البحر أو على الأرض التنانين = الحيتان العظيمة والتماسيح. واللجج =هي البحار وكل ما يعيش فيها أي المخلوقات البحرية والمخلوقات التي تعيش في أعماق البحار.

 

الآيات (11-14): "مُلُوكُ الأَرْضِ وَكُلُّ الشُّعُوبِ، الرُّؤَسَاءُ وَكُلُّ قُضَاةِ الأَرْضِ، الأَحْدَاثُ وَالْعَذَارَى أَيْضًا، الشُّيُوخُ مَعَ الْفِتْيَانِ، لِيُسَبِّحُوا اسْمَ الرَّبِّ، لأَنَّهُ قَدْ تَعَالَى اسْمُهُ وَحْدَهُ. مَجْدُهُ فَوْقَ الأَرْضِ وَالسَّمَاوَاتِ. وَيَنْصِبُ قَرْنًا لِشَعْبِهِ، فَخْرًا لِجَمِيعِ أَتْقِيَائِهِ، لِبَنِي إِسْرَائِيلَ الشَّعْبِ الْقَرِيبِ إِلَيْهِ. هَلِّلُويَا."

هنا يطلب المرنم من الخليقة الناطقة أن تسبح الله، ملوك وعامة الشعب.

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