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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القس أنطونيوس فكري

مزمور 36 - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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غير واضح زمن ومناسبة كتابة هذا المزمور. ولكنه هو مزمور يتأمل فيه داود في سبب أن الأشرار (ربما الذين اضطهدوه، أو الأشرار عمومًا) يرتكبون شرورهم وأنهم بهذا يتغربون عن الرب ونرى صورة لفساد الأشرار، وفي المقابل نرى صورة لكمال الله المتعدد الجوانب.

 

آية (1): "نأمة معصية الشرير في داخل قلبي أن ليس خوف الله أمام عينيه."

نأمة معصية الشرير في داخل قلبي = قلبي يحدثني أن سبب معصية الشرير. أن ليس خوف الله أمام عينيه والنصف الأول من الآية مترجم هكذا في الإنجليزية THE TRANSGRESSION OF THE WICKED SAITH WITHIN MY HEART لذلك يقول الحكيم مخافة الرب رأس المعرفة (أم7:1).

 

آية (2): "لأنه ملّق نفسه لنفسه من جهة وجدان أثمه وبغضه."

لأنه ملَّقَ نفسه = هو خدع ذاته وغشها ليرضي ذاته، أو خدع نفسه ليرضي نفسه ويعمل ما تشتهيه نفسه من آثام وخداع إنسان شرير لإنسان آخر يتم والضحية البريء لا يدري أما هنا فنجد أن هذا الإنسان يخدع نفسه أمام عيني نفسه. فهو حين يكتشف خطيته يتعلل بعلل كقوله "أنا لا أعلم أن هذا الفعل خطية" أو "كل الناس يعملون هذا الشيء" أو "إن الله هو الذي أوجدها أمامي" أو "أنا ضعيف وظروفي كده". هذا شيء يشبه من يستعمل نوع من المسكنات ليسكن ألم جسدي، وهنا هو يجد مبررات ليسكن آلام ضميره. ومن يخاف الرب لا يقل مثل هذا الكلام بل يعترف بخطيته طالبًا الرحمة. ولكن من يخدع نفسه يُدمِّر نفسه حقيقة. ولنلاحظ أن الشيطان لا يستطيع أن يخدعنا إن كنا لا نخدع أنفسنا. من جهة وجدان اثمه وبغضه = حين يكتشف خطيته أو يكتشفها الناس، وهنا وحتى لا يكرهه أحد أو يلومه بل حتي لا يلومه ضميره يخترع المبررات.

 

الآيات (3، 4): "كلام فمه إثم وغش. كف عن التعقل عن عمل الخير. يتفكر بالإثم على مضجعه. يقف في طريق غير صالح. لا يرفض الشر."

الشرير يقف في طريق غير صالح = أما العاقل فيعرف أنه ضعيف ويمكن لهذا الطريق أن يجذبه، لهذا يهرب من طرق الشر ويرفضها.أما هذا الشرير فكل كلامه فاسد وأفكاره فاسدة حتى وهو علي مضجعه. نهايته رهيبة. وإصراره علي هذا الطريق هو الجنون بعينه = كف عن التعقل عن عمل الخير.

 

آية (5): "يا رب في السموات رحمتك. أمانتك إلى الغمام."

فِي السَّمَاوَاتِ رَحْمَتُكَ = الله له مراحم أرضية مادية. فهو يشرق شمسه على الأبرار والأشرار وهناك بركات سماوية روحية يتذوقها أولاده. أَمَانَتُكَ إِلَى الْغَمَأمِ = رحمة الله تنزل علينا كما ينزل المطر من السحاب. والسحاب يشير للقديسين وبشفاعتهم لنا بركات. وتشير للأنبياء الذين بنبواتهم نشبع من كلمات الكتاب المقدس ويشير السحاب لأن مراحم الله عالية جدًاً، فائقة ومرتفعة وعظيمة للغاية، ومهما كانت متاعبنا فمراحم الله أعلى وأعظم، وهو يهب رجاء لأولاده، بل يحولهم إلى سماء ولسحاب مرتفع عن الأرض. وتشير الآية أن إرتفاع أمانة الله تعني أنها في حكمتها غير مدرَكة لعقولنا، لأن الله في محبته يدبر لنا أعلى نصيب في السماويات، أما نحن فكل تفكيرنا محصور في أن محبة الله لنا برهانها هو في حصولنا علي أكبر قدر من الأرضيات وأقل قدر من الآلام. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). فهل فكر أحد يوما أن الموت وآلام هذا العالم هي الطريق للسماء. وأليس هذا ما نصليه في القداس "حوَّلت ليَ العقوبة خلاصًا".

 

آية (6): "عدلك مثل جبال الله وأحكامك لجة عظيمة. الناس والبهائم تخلّص يا‏ رب."

تدابير الله ترفعنا من عمق الخطية وتهبنا بر المسيح. وتدابيره راسخة عالية كالجبال وعميقة جدًاً لا يمكن أن نفهم أعماقها كما أنه لا يمكننا النزول لاكتشاف أعماق البحار. ومراحمه تصل لكل البشر بل حتى إلى الخليقة الحيوانية غير العاقلة= النَّاسَ وَالْبَهَائِمَ تُخَلِّصُ يَا رَبُّ = فهو يطعم ويحفظ كل الخليقة (يون4: 11) . جبال الله = في العبرية حين يضاف اسم الله لشيء فهذا للدلالة على عظم هذا الشيء فيكون تعبير جبال الله يعنى به الجبال العالية جدًا، والمعنى أن عدل الله عظيم جدًا وعال جدًا.

 

الآيات (7-9): "ما اكرم رحمتك يا الله. فبنو البشر في ظل جناحيك يحتمون. يروون من دسم بيتك ومن نهر نعمك تسقيهم. لأن عندك ينبوع الحياة. بنورك نرى نورًا."

الله يحمي أولاده، ويشبعهم من خيراته، يملأهم فرحًا وبهجة فلا يحتاجون إلى الملذات الزمنية، يجدون في مخلصهم سر فرحهم الحقيقي، يملأهم من روحه القدوس ينبوع الحيوة فتكون لهم ثماره. ويعطيهم الروح استنارة = بنورك نعاين النور. وهو يكشف لنا حتى أعماق الله (1كو9:2-12). وبنورك (المسيح) نعاين النور (الروح القدس) فبدون عمل المسيح الفدائي ما كان الروح القدس قد حل على الكنيسة. وبالاستنارة التي يعطيها الروح القدس لنا ( النور) نعرف المسيح (النور)." (يو 16: 12-16) والروح القدس هو الذي يفتح ويدرب كل حواسنا الروحية فنفهم أمور السمائيات.

 

الآيات (10-12): "أدم رحمتك للذين يعرفونك وعدلك للمستقيمي القلب. لا تأتني رِجْل الكبرياء ويَد الأشرار لا تزحزحني. هناك سقط فاعلو الإثم. دحروا فلم يستطيعوا القيام."

كل نفس تذوقت عطايا الله، تصلي مع المرنم ليديم لها الله هذه المراحم فلا تفقد سلامها. ويبعد عنها الكبرياء الذي بسببه يبتعد عنها الله. ويبعد عنها الأشرار حتى لا تغوى النفس وراء شرورهم فيفقدوا طهارتهم وبالتالي سلامهم. هُنَاكَ سَقَطَ فَاعِلُو الإِثْمِ = ففي الكبرياء والشر سقط فاعلو الإثم فَلَمْ يَسْتَطِيعُوا الْقِيَأمَ = والأشرار الذين يدبرون الشر لأولاد الله يسقطون في شرورهم هذه ويسقطوا تحت لعنتها. أما عدل الله فيستمتع به المستقيمي القلوب الذين لا يخدعوا أنفسهم ويتملقونها. لاَ تَأْتِنِي رِجْلُ الْكِبْرِيَاءِ = إبعد عني شر المتكبرين. وكما يقول الحكيم "قبل الكسر الكبرياء وقبل السقوط تشامخ الروح" (أم16: 18).

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