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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القس أنطونيوس فكري

مزمور 90 - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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كاتب المزمور هو موسى، وكتبه غالبًا بعد الخروج من مصر. وهو صلاة لموسى غالبًا قد كتبها بعد أن عاقب الله الشعب على تذمرهم وعدم إيمانهم وتمردهم عليه. والله عاقب الشعب بأن ماتوا كلهم في البرية ما عدا يشوع وكالب فقد دخلوا أرض الميعاد. ولقد رأى موسى ضربات الله ضد الشعب بسبب التذمر ورأى كيف أن غضبه رهيب.

 

الآيات (1، 2): "يا رب ملجأ كنت لنا في دور فدور. من قبل أن تولد الجبال أو أبدأت الأرض والمسكونة منذ الأزل إلى الأبد أنت الله."

قبل أن يبدأ موسى صلاته، يعترف أولًا لله بقوته وقدرته وحمايته لشعبه.

 

الآيات (3-6): "ترجع الإنسان إلى الغبار وتقول ارجعوا يا بني آدم. لأن ألف سنة في عينيك مثل يوم أمس بعدما عبر وكهزيع من الليل. جرفتهم. كسنة يكونون. بالغداة كعشب يزول. بالغداة يزهر فيزول. عند المساء يجزّ فييبس."

نجد موسى هنا يتواضع أمام الله ويعترف بضعف البشر، وإنما هم تراب ويرجعون إلى التراب بسبب خطيتهم وذلك بسبب عقوبة الله لآدم (تك19:3). ارْجِعُوا يَا بَنِي آدَمَ = تفهم أن الله يقول أرجعوا إلى التراب الذي أخذتم منه ولكنها تفهم أيضًا بمعنى توبوا فلا يكون مصيركم التراب. وحتى لو عاش الإنسان ألف سنة فهي في عيني الله الأزلي الأبدي كلا شيء = مِثْلُ يَوْمِ أَمْسِ بَعْدَ مَا عَبَرَ. ولقد عاش آدم حوالي 1000سنة فأين هو الآن. ولو عاش الإنسان 1000سنة في الخطية ثم تاب يغفرها الله، بل ينساها الله، كأنها هزيع من الليل قد مر وإنتهى. جَرَفْتَهُمْ. كَسِنَةٍ يَكُونُونَ = "الموت يأتي كطوفان يجرفهم" (هكذا جاءت الترجمة في الإنجليزية) والطوفان لا يبقى شيئاً أمامه. ومع أن الكل يعرف أنه سيموت إلا أننا نعيش كما لو كنا في حلم نتصوَّر أنه لا ينتهي، ونحلم بأشياء كثيرة عظيمة كأننا سنعيش إلى الأبد، ويأتي الموت ليوقظنا من هذا الحلم. فالوقت يمر بالإنسان دون أن يشعر الإنسان به، كما يمر الوقت على الإنسان النائم دون أن يشعر به كسِنَةٍ يكونون = السِنَة هي النوم. وحياة الإنسان قصيرة مثل عشب يزهر في الصباح ولكن سريعاً ما يأتي من يقطعه وسريعاً ما يجف ويموت ويفقد كل جماله. والإنسان حتى في نهاية حياته نجده ضعيفاً مثل العشب.

 

الآيات (7-11): "لأننا قد فنينا بسخطك وبغضبك ارتعبنا. قد جعلت آثامنا أمامك خفياتنا في ضوء وجهك‏. لأن كل أيامنا قد انقضت برجزك. أفنينا سنينا كقصة. أيام سنينا هي سبعون سنة. وأن كانت مع القوة فثمانون سنة وافخرها تعب وبلية. لأنها تقرض سريعًا فنطير. من يعرف قوة غضبك. وكخوفك سخطك."

النبي هنا يعترف أمام الله بخطايا الشعب وأنهم يستحقون الآلام التي وضعت عليهم. وأن أيامهم انقضت في أحزان بسبب خطاياهم، ولتعرضهم لغضب وسخط الله خفياتنا في ضوء وجهك= على كل إنسان أن يعلم أنه في كل ما يعمله ويفكر فيه، هو مكشوف أمام الله. أفنينا سنينًا كقصة= أي تنتهي سريعًا. وللأسف فهي قصة محزنة مؤلمة.

 

الآيات (12-17): "إحصاء أيامنا هكذا علمنا فنؤتى قلب حكمة. ارجع يا رب. حتى متى. وترأف على عبيدك. أشبعنا بالغداة من رحمتك فنبتهج ونفرح كل أيامنا. فرحنا كالأيام التي فيها أذللتنا كالسنين التي رأينا فيها شرا. ليظهر فعلك لعبيدك وجلالك لبنيهم. ولتكن نعمة الرب إلهنا علينا وعمل أيدينا ثبت علينا وعمل أيدينا ثبته."

صلاة موسى في الختام ليتراءف الرب ويرفع غضبه عن شعبه. ومعنى آية (12) أعطنا يا رب أن نفهم أن حياتنا قصيرة فنكف عن عمل الشر. والقلب الذي يكف عن الشر هو قلب حكمة، القلب المستعد دائمًا لهذا اليوم الذي يقابل فيه الله هو قلب حكمة ونفرح كل أيامنا= من يحيا في التوبة لا يضمن حياته الأبدية فقط بل يحيا فرحًا كل أيامه. بل أفراحه بعد التوبة ستجعله ينسى أيام أحزانه بسبب الخطية= فرحنا كالأيام التي فيها أذللتنا= حين نخطئ فالله يؤدب لنعود بالتوبة، وإذا عدنا يعطينا فرحًا. ليظهر فعلك لعبيدك = الله يتوبنا ويغير صورتنا فنصبح على صورة المسيح، وهذه الصورة تظهر قوة عمله في التغيير والتجديد وليس هذا فقط، بل هو يبارك فيما نعمله بأيدينا = عمل أيدينا ثبت علينا. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). ولكن علينا أن نصلي ليبارك الله في أعمالنا وجهادنا. فالله يعمل فينا لنتوب ونتغير إلى صورته ولكن هو يطلب الجهاد= عمل أيدينا= علينا أن نعمل من أجل خلاص نفوسنا فتنسكب علينا نعمة الله، فلا نعمة بدون جهاد. ونحن نجاهد ونصلي لينجح العمل. والنبي يكرر هذه الصلاة عمل أيدينا يثبت علينا وعمل أيدينا ثبته= لأننا لا نستحق لذلك نطلب بلجاجة أن ينظر الله إلينا نحن الغير مستحقين لمراحمه.

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