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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القمص أنطونيوس فكري

مزمور 43 (42 في الأجبية) - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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يعتقد البعض أن (مز42، مز43) يمثلان وحدة واحدة. فيهما يصرخ المرتل وغالبًا هو داود في حزنه لله مشتاقًا للرجوع للعبادة في هيكل الله لينعم بالحضرة الإلهية. ولذلك اقترح البعض أن يكون داود قد كتب هذا المزمور (42، 43) في فترات هروبه من أمام شاول أو أبشالوم يعبر عن اشتياقه للعودة إلى الهيكل. وفي (مز42) نراه بعنوان قصيدة لبني قورح، ويغلب أن داود كتبه وأعطاه لبني قورح لترنيمه.

        ·            جاء المزمور نبوة عن كل من أرغمته الظروف أن يبتعد عن أورشليم وعن الهيكل لذلك قيل أنه نبوة عن السبي. (المقصود 42، 43 كلاهما كوحدة واحدة). ولذلك وبنفس المفهوم فكل من استعبد للخطية تحت يد العدو القاسي يمكنه أن يرنم بهذه الكلمات تعبيرًا عن اشتياقه للعودة من السبي، والسبي هنا يشير إلى الخطية الداخلية وإلى الأعداء الخارجيين (إبليس ومن يتبعه).

        ·            يتخذ المزمور كنبوة عن المسيح المتألم من الأمة اليهودية غير الراحمة ومن يهوذا رجل الغش (آية1) لذلك نصلي هذا المزمور في صلاة الساعة الثالثة.

        ·            الترجمة السبعينية تشير صراحة أن كاتب المزمور هو داود.

 

آية (1): "اقض لي يا الله وخاصم مخاصمتي مع أمة غير راحمة ومن إنسان غش وظلم نجني."

قد يكون القائل هو المسيح، أو داود، أو الشعب في بابل يشتكون من البابليين أو أي مسيحي يشعر بآلام الاستعباد لخطية ما. ولمن نلجأ سوى لله ليخلصنا ويقضي لنا.

 

آية (2): "لأنك أنت إله حصني. لماذا رفضتني. لماذا أتمشى حزينًا من مضايقة العدو."

المرتل يصرخ لله فهو وحده قوته. وقد يشعر الخاطئ أن الله رفضه إذ يفقد التعزيات وقد يشعر المريض أو المتألم أو المضطهد أن الله تركه = لماذا رفضتني. وكان هذا هو ما قاله المسيح "إلهي إلهي لماذا تركتني". فهي صرخة المتألم في ألمه. ولكن يحسب للمرتل قوله أتمشى. فالضيقة لم تصبه بالشلل ولم يتوقف ولم يتراخ عن جهاده بالرغم من حزنه. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). والمسيح استمر في طريق الصليب ولم يتراجع بالرغم من أنه قال "نفسي حزينة جدًا حتى الموت". ومضايقة العدو هنا هي الخطية الساكنة فيَّ أو هو إبليس بمؤامراته فالخطية تسبب الحزن بينما البر سبب فرح.

 

آية (3): "أرسل نورك وحقك هما يهديانني ويأتيان بي إلى جبل قدسك وإلى مساكنك."

المرتل يطلب عون الله لكي يرجع من سبيه = (الخطية أو من بابل) ولكن بروح النبوة فداود مشتاق لتجسد المسيح فيقول لله أَرْسِلْ نُورَكَ وَحَقَّكَ، هُمَا يَهْدِيَانِنِي فالمسيح الذي هو نور العالم وهو الحق هو الذي سيقود مسيرة الكنيسة جسده إلى جبل قدس الله أي السماء. جَبَلِ قُدْسِ الله أي لأورشليم بالنسبة لداود البعيد عن الهيكل أو لعودة الخاطئ لحياة الشركة المفرحة في الكنيسة بيت الخلاص. الكنيسة هي الجبل الذي رآه دانيال حجرًا صغيرًا ثم نما وكبر وصار جبلًا كبيرًا ملأ وجه الأرض وطلبة هذه الكنيسة لرأسها الرب يسوع هي أَرْسِلْ نُورَكَ وَحَقَّكَ هُمَا يَهْدِيَانِنِي = هي طلبة كل نفس حتى لا تخسر الشركة في جبل قدس الله. فالرب يسوع هو نور الآب وحقه فهو الذي قال "أنا هو نور العالم". والطريق الوحيد للخلاص هو الطلب واللجاجة.

 

آية (4): "فآتي إلى مذبح الله إلى الله بهجة فرحي وأحمدك بالعود يا الله إلهي."

يقول هذا المسبيين ليرجعوا إلى مذبح الله في أورشليم. وتقولها كل نفس انفصلت عن شركة التناول بسبب خطاياها، وحينما تعود للشركة تعود لها أفراحها وتسابيحها فهي في فترة سبيها تركت التسبيح والقيثارة (مز137). وذبيحة التناول تعطي لمغفرة الخطايا، وفيها حياة أبدية لمن يتناول منها. إن الفرح هو سمة ملازمة للمسيحي الذي يتذوق دائمًا بركات المذبح والغفران وهو عطية المسيح ومن ثمار الروح (يو16: 22 + غل5: 22)

 

آية (5): "لماذا أنت منحنية يا نفسي ولماذا تئنين فيّ. ترجي الله لأني بعد أحمده خلاص وجهي وإلهي."

هنا نصيحة المرتل لكل مُنْحَنِيَ النَفْسِ = لكل من يحمل أثقال الخطية أو الهموم أن يترجوا الله، يطلبوه ويثقوا في استجابته. والمسيح يستجيب ويعطي راحة. وبعد أن يستجيب يتحول هذا لتسبيح وحمد وشكر = لأَنِّي بَعْدُ أَحْمَدُهُ.

والقيثارة والعود يرمزان لحواس المؤمن وقواه العقلية التي يحركها الروح القدس فتعطي أنغام التسبيح من قلب محب لله طاهر وهذا يتم بطاعة الوصية.

والآن لماذا أنت منحنية يا نفسي ولماذا تئنين؟ فلا معنى لليأس بعد أن عرفت طريق فرحك وسلامك فقدمي توبة وارجعي إلى الله فيرجع إليك فتتحرك أوتار قيثاراتك بالتسبيح.

خَلاَصَ وَجْهِي = وجهى هنا هي ما يظهر على الوجه من علامات الفرح (يقال إنبسطت أساريره على من يتحول وجهه إلى علامات الإرتياح والفرح بدلا من القلق والغم والحيرة). فخلاص الله وإستجابته ستجعل وجهى مبتسما وفي مظهر الفرح. وسأحمد إلهي الذي صنع هذا = لأَنِّي بَعْدُ أَحْمَدُهُ، هو خَلاَصَ وَجْهِي الذي أعطانى هذا التهليل وهو إِلهِي.

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