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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القس أنطونيوس فكري

مزمور 50 - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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أساف كان رئيس فرقة الموسيقيين في الخيمة (1أي4:16، 5، 7).

هذا المزمور نبوة تعلن عن الدينونة العامة، وتكشف عن إدانة الله للرياء في العبادة حيث تمارس في شكليات بلا روح، وإدانة الحياة الشريرة، ويحذر من الاستخدام الخاطئ للطقس، خاصة تقديم الذبائح، كقناع يخفي وراءه العابدون شرورهم. هنا ينبه أساف إلى أن الله ليس في حاجة إلى ذبائح وعطايا الناس بل إلى القلب النقي الشاكر لله. وهناك مجموعة من المزامير تنسب لأساف، وغالبًا فمن ألف وكتب هذه المزامير قد كتبها على طريقة أساف أو من مجموعة أساف خرج كُتّاب هذه المزامير. فبعض المزامير المنسوبة لأساف يتضح أنها كتبت بعد السبي.

 

الآيات (1-3): "إله الآلهة الرب تكلم ودعا الأرض من مشرق الشمس إلى مغربها. من صهيون كمال الجمال الله اشرق. يأتي إلهنا ولا يصمت. نار قدامه تأكل وحوله عاصف جدًا."

يمكن تطبيقها على المجيء الأول للمسيح وعلى مجيئه الثاني.

التطبيق على المجيء الأول: في (1) نرى تجسد المسيح (عب1:1، 2) فالآب كلمنا في ابنه ليدعو الأرض كلها أممًا ويهود لكنيسته. وفي (2) نرى سر جمال الكنيسة = صهيون أن الله أشرق فيها. وفي (3) نرى تعاليم المسيح = إلهنا لا يصمت. ونرى إرساله للروح القدس = نار قدامه وحوله عاصف جدًا. هذا ما حدث يوم الخمسين فقد حل الروح القدس على هيئة ألسنة نار مع هبوب ريح عاصف لتطهر الرسل القديسين من كل ضعف، فالنار تحرق الخطايا وتشعل القلب بالحب.

التطبيق الثاني، على مجيئه الثاني: الله سيتكلم في مجيئه الثاني، حين يدعو كل إنسان للدينونة، ليس كلام تعليم وكرازة بل كلمات دينونة للأشرار. وأما كنيسته فيكمل جمالها في هذا اليوم، فالمسيح صار يسكن وسط كنيسته الممجدة في أورشليم السمائية = جبل صهيون. ويستعلن = من صهيون كمال الجمال. لقد كان جمالها على الأرض أن المسيح في وسطها يعطيها جمالًا وقوة، كان يعينها في جهادها لتحفظ وصاياه، وتكون بطهارتها جمالًا للعالم. وفي اليوم الأخير ستستعلن كعروس للمسيح وجماله ومجده ينعكس عليها (1يو1:3، 2). والنار هنا هي نار الدينونة للأشرار. إله الآلهة= الآلهة هم أولاد الله الذين هم على صورته، فالله أقام موسى إلهًا لفرعون وراجع (مز 1:82، 6، 7 + يو12:1). أما آلهة الشعوب فهي أصنامهم وشياطينهم. والمسيح إله الآلهة حين جاء في مجيئه الأول وصلت كرازته لكل أرجاء المسكونة. ولذلك ففي مجيئه الثاني سيدين كل واحد بحسب قبوله أو رفضه للإيمان وبحسب قبوله ورفضه لتنفيذ وصاياه. لقد أتى بناره لينقي ويمحص في مجيئه الأول، وفي مجيئه الثاني سوف يحرق من يجده قشًا وينقي ويقبل الذهب والفضة اللذان نقاهما.

 

الآيات (4-6): "يدعو السموات من فوق والأرض إلى مداينة شعبه. اجمعوا إليّ أتقيائي القاطعين عهدي على ذبيحة. وتخبر السموات بعدله لأن الله هو الديان. سلاه."

نرى هنا صورة المحاكمة حين يدعو الله السموات = الملائكة. والأرض = القديسين والرسل (مت28:19). إلى مداينة شعبه = محاكمتهم. وسيجمع الله مختاريه الأبرار الذين كانوا في عهد معه بتقديم ذبائح [1] قدموا أجسادهم ذبيحة حيَّة (رو1:12) [2] قدموا ذبائح التسبيح والرحمة بالفقراء (عب15:13، 16) [3] قدموا ذبائح الانسحاق (مز16:51، 17). فكل من دخل مع الله في عهد يقدم ذبائح كهذه. في هذا اليوم يظهر عدل الله الديان.

 

الآيات (7-15): "اسمع يا شعبي فأتكلم. يا إسرائيل فاشهد عليك. الله إلهك أنا. لا على ذبائحك أوبخك. فان محرقاتك هي دائمًا قدامي. لا آخذ من بيتك ثورًا ولا من حظائرك اعتدة. لأن لي حيوان الوعر والبهائم على الجبال الألوف. قد علمت كل طيور الجبال ووحوش البرية عندي. أن جعت فلا أقول لك لأن لي المسكونة وملأها. هل آكل لحم الثيران أو اشرب دم التيوس. اذبح لله حمدًا وأوف العلي نذورك. وادعني في يوم الضيق أنقذك فتمجدني. وللشرير قال الله مالك تحدث بفرائضي وتحمل عهدي على فمك. وأنت قد أبغضت التأديب وألقيت كلامي خلفك."

نرى هنا صورة لدينونة الشكليين في العبادة. الله إلهك أنا= يكفي هذا فخرًا لأي إنسان أن يكون الله إلهه. وقد اختار الله إسرائيل شعبًا له في العهد القديم. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). وكانت الكنيسة عروسه في العهد الجديد، أعطاها جسده ودمه حياةً لها وأعطاها روحه القدوس يسكن فيها. لقد أعطانا الله الكثير وسنحاسب على ما أخذناه. ونرى الله هنا لا يطلب ذبائح ولكن يطلب القلب. ولاحظ عتاب الله الرقيق= لا أخذ من بيتك ثورًا= فنحن يجب أن نفهم أن الأرض وما عليها كلها لله. وما لدينا فهو عطية منه، وما نقدمه له فهو سبق وأعطاه لنا، ومن يده نعطيه. فنحن لا نتفضل عليه بشيء (1أي14:29). إن جعت فلا أقول لك لأن لي المسكونة= الله لا يجوع ولكنه هنا يعاتب اليهود الذين كانوا يشعرون أنهم يتفضلون على الله بذبائحهم. والله لا يحتاج لشيء بل هو يريد أن نقدم للفقراء في محبة له هو.

 

الآيات (16-23): "إذا رأيت سارقًا وافقته ومع الزناة نصيبك. أطلقت فمك بالشر ولسانك يخترع غشًا. تجلس تتكلم على أخيك. لابن أمك تضع معثرة. هذه صنعت وسكت. ظننت أني مثلك. أوبخك واصفّ خطاياك أمام عينيك. افهموا هذا يا أيها الناسون الله لئلا افترسكم ولا منقذ. ذابح الحمد يمجدني والمقوم طريقه أريه خلاص الله."

نرى هنا محاكمة الأشرار المرائين. ففي (16) نرى هذا المرائي يتكلم بفمه بكلام الله. وفي (17) نجده رافضًا تأديب الله (عب7:12) أما أولاد الله فيشكرونه على كل حال (23) ذابح الحمد= من يشكر الله فكمن يقدم ذبيحة مقبولة. المقوِّم طريقه= من يتوب ويتضع كالعشار (لو13:18). ونرى طول أناة الله (2) هذه صنعت وسَكَتُّ. ولكن في يوم الدينونة لن يسكت بل يظهرها= أَصُفُّ خطاياك أمام عينيك. فلا ينطق الشرير ونلاحظ قوله ظننت أني مثلك= فالإنسان في شره يتصوَّر أن الله قد قبل شروره طالما هو ساكت لا يعاقب. ولكن الله يطيل أناته ويذخر غضبًا ليوم الدينونة (رو2:2-10).

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