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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القس أنطونيوس فكري

مزمور 115 - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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الترجمة السبعينية تضم هذا المزمور على المزمور السابق. وفيه نتعلم أن نعطي المجد لله لا لأنفسنا، لله لا للأوثان. ونعطى المجد لله بأن نثق فيه ونتكل عليه وليس على مخلوق سواه، وبأن نباركه أي نسبحه ونشهد له أمام كل إنسان. وعلينا أن نصلي بهذا المزمور دائمًا، خاصة لو أحاطت بنا الضيقات.

 

الآيات (1-3): "ليس لنا يا رب ليس لنا لكن لاسمك أعط مجدا من أجل رحمتك من أجل أمانتك. لماذا يقول الأمم أين هو إلههم. أن إلهنا في السماء. كلما شاء صنع."

حينما عيَّر ربشاقي إله إسرائيل حينما حاصر أورشليم أيام حزقيا الملك. صلي حزقيا لله حتى يتمجد أمام الأعداء الذين عيَّروا الإله الحي (أش18:36-20، 14:37-20) والمرنم هنا كأنه يعترف قائلًا "نحن يا رب لا نستحق مراحمك، ولكننا محسوبين عليك والعالم يعرف أننا شعبك، فلا تجعلهم يقولون أين هو إلههم، بل أنقذنا فتتمجد أنت ويعرف الجميع أن إلهنا في السماء، عاليًا ممجدًا، عظيمًا كلما شاء صنع.

 

الآيات (4-8): "أصنامهم فضة وذهب عمل أيدي الناس. لها أفواه ولا تتكلم. لها أعين ولا تبصر. لها آذان ولا تسمع. لها مناخر ولا تشم. لها أيد ولا تلمس. لها أرجل ولا تمشي ولا تنطق بحناجرها. مثلها يكون صانعوها بل كل من يتكل عليها."

ليس فينا الآن من يعبد أصنامًا. ولكن أصنام العصر الحالي هي، المال، والشهوة، وتعظم المعيشة والمراكز العالية. هناك من يعتمد على إنسان بسبب مركزه، وهناك من يجري وراء المال حاسبًا أنه يحميه من اضطرابات الزمن. وهناك من يسعى لأن يشبع شهوته. مثلها يكون صانعوها = كل هذا سواء مال أو مراكز أو شهوة هي أشياء باطلة، موجودة اليوم، أما غدًا فهي تزول. فمن يتكل عليها يصير مثلها باطل زائل. وأما من يتكل على الرب يتحول ليصير على صورته كشبهه.

 

الآيات (9-11): "يا إسرائيل اتكل على الرب. هو معينهم ومجنهم. يا بيت هرون اتكلوا على الرب. هو معينهم ومجنهم. يا متقي الرب اتكلوا على الرب. هو معينهم ومجنهم."

هي دعوة لكل شعب الرب أن يباركوه. إسرائيل وشعبها. والكهنة بني هرون.

والأمم= متقي الرب. فهو الذي يحميهم= معينهم ومجنهم. وهذا مقابل الأوثان التي لا تستطيع أن تحمي عابديها.

 

الآيات (12-18): "الرب قد ذكرنا فيبارك. يبارك بيت إسرائيل يبارك بيت هرون. يبارك متقي الرب الصغار مع الكبار. ليزد الرب عليكم. عليكم وعلى أبنائكم. انتم مباركون للرب الصانع السموات والأرض. السموات سموات للرب. أما الأرض فأعطاها لبني آدم. ليس الأموات يسبحون الرب ولا من ينحدر إلى ارض السكوت. أما نحن فنبارك الرب من الآن والى الدهر. هللويا."

الرب هو الذي يبارك شعبه، ويزيد بركته عليهم، وعلى أبنائهم. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). والرب صنع السموات والأرض. وهو جالس على عرشه في السموات = السموات سموات للرب. أما الأرض فأعطاها لبني آدم = هو صاحب الكرم أي الأرض فهو خالقها ولكنه استأمن البشر عليها وينتظر منهم كصاحب أرض أن يقدموا ثمارًا صالحة (مت21: 33 – 44). وما هي الثمار الصالحة التي يطلبها الرب ويفرح بها؟ التسبيح. والتسبيح علامة أن الإنسان حي= ليس الأموات يسبحون الرب. ومن هم الأموات؟ هم الأموات بالخطايا وهؤلاء لا يستطيعون أن يسبحوا الله (مز4:137 + رؤ1:3). وبالتوبة نسمع عن الابن الضال "ابني هذا كان ميتًا فعاش". ومن بتوبته يعود للحياة يعود ليسبح الرب = أما نحن الأحياء فنبارك الرب.

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