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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القمص أنطونيوس فكري

مزمور 119 (118 في الأجبية) - قطعة ل - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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قطعة (ل) النفس التي اختبرت الله تثق في صدق وعوده

 

آية (89): "إِلَى الأَبَدِ يَا رَبُّ كَلِمَتُكَ مُثَبَّتَةٌ فِي السَّمَاوَاتِ."

المرنم يضع هنا إختباره، إن كلمة الله ثابتة غير متغيرة "الله ليس عنده تغيير ولا ظل دوران" (يع17:1) ، وهكذا كل مشوراته وتدبيراته. ولذلك وصاياه لا ولم ولن تتغير، وهي لخيرنا دائما. وهذا ظاهر في خلقة السموات التي نراها ثابتة لا تتغير فأنت تحفظها بكلمتك. ومن هم في السماء أي الملائكة يحفظون كلمتك وهي ثابتة فيهم بالمقارنة معنا نحن يا من في الأرض، فالإنسان لم يستطع أن يحفظ وصايا الله. وأحكام الله بحكمة عالية لا نفهمها نحن وهي تعلو عنا وعن إدراكنا، كما تعلو السموات عن الأرض. ومهما كانت وعود الله بعيدة كبعد السماء، فهي ستتحقق في ملء الزمان. وكل من تثبت كلمة الله فيه يصير سماويًا. وتفهم الآية عن الابن كلمة الله الأزلي الذي خلق كل شيء.

 

الآيات (90، 91): "إِلَى دَوْرٍ فَدَوْرٍ أَمَانَتُكَ. أَسَّسْتَ الأَرْضَ فَثَبَتَتْ. عَلَى أَحْكَامِكَ ثَبَتَتِ الْيَوْمَ، لأَنَّ الْكُلَّ عَبِيدُكَ."

دليل آخر على ثبات كلمة الله هو ثبات الأرض التي نحيا عليها. والأرض ببحارها وتوالي فصولها هي هي كما تركتها كل الأجيال السابقة= إلى دور فدور أمانتك الله بأمانته حفظ الأرض لكل الأجيال. على أحكامك ثبتت اليوم= بأحكام الله ورعايته ثبتت السموات والأرض إلى هذا اليوم. العجيب أن كل الخليقة تأتمر بأمر الله وتثبت بكلمته.  الكل عبيدك = الكل خاضع لأوامر مشيئتك كعبد أمام سيده، حتى الخليقة الجامدة كالأرض بما عليها من بحار وجبال....إلخ  والكواكب.ولا يوجد من يتمرد على كلمة الله سوى الإنسان. 

وهذه الآية تفهم أن الله بأمانته، كان أمينًا مع جيل اليهود، ولما رفضه اليهود كان أمينًا مع الكنيسة وفي نهاية الأيام سيرجع اليهود وسيكون أمينًا معهم لأجل وعوده الثابتة مع آبائهم (رو9، 10، 11). وفي السبعينية يقول "أسست الأرض فهي ثابتة بأمرك والنهار أيضًا ثابت" ومن هذا نفهم أن الأرض هي الكنيسة التي على الأرض التي آمنت بالمسيح السماوي، شمس البر، فصار لها أن تعيش في نور نهاره هنا على الأرض وفي الأبدية.

 

الآيات (92، 93): "لَوْ لَمْ تَكُنْ شَرِيعَتُكَ لَذَّتِي، لَهَلَكْتُ حِينَئِذٍ فِي مَذَلَّتِي. إِلَى الدَّهْرِ لاَ أَنْسَى وَصَايَاكَ، لأَنَّكَ بِهَا أَحْيَيْتَنِي."

الخطية تذل الإنسان، وحينما فقد الإنسان حساسية قلبه الذي كان مكتوبًا عليه وصية الله، أعطانا الله الناموس عونا. ومن اتبع الوصايا التي جاءت في الناموس تخلص من الذل. ومن اختبر هذا يردد = إلى الدهر لا انسي وصاياك 

وأولاد الله يضطهدون من العالم، وما يعزيهم هو اللهج في كلام الله المحيي وتنفيذه = لانك بها احييتني. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). ولننظر الشهداء مساقين للموت وهم يسبحون بكلمة الله، لذلك لم ينكروا إيمانهم إذ عزاهم الله وثبتهم فكانت لهم حياة.

 

آية (94): "لَكَ أَنَا فَخَلِّصْنِي، لأَنِّي طَلَبْتُ وَصَايَاكَ."

لَكَ أَنَا = رائع أن يصل الإنسان أن يعطي نفسه بالكامل لله ويشعر أيضًا أن الله له "أنا لحبيبي وحبيبي لي" (نش16:2). ولكي نصل لهذا فلنرى الطريقة = لأَنِّي طَلَبْتُ وَصَايَاكَ = اذًا حتى نكون لله نحفظ الوصية فنعرفه ونحبه ونثق فيه فنسلم له حياتنا.

 

آية (95): "إِيَّايَ انْتَظَرَ الأَشْرَارُ لِيُهْلِكُونِي. بِشَهَادَاتِكَ أَفْطُنُ."

الأشرار بقيادة إبليس يضعون لي شراكًا لِيُهْلِكُونِي، ووصيتك تنير لي الطريق.

أَفْطُنُ = أدرك أين الشرك وأعرف كيفية التصرف الصحيح فلا أهلك.

 

آية (96): "لِكُلِّ كَمَال رَأَيْتُ حَدًّا، أَمَّا وَصِيَّتُكَ فَوَاسِعَةٌ جِدًّا."

وصيتك فواسعة جدًا= في الآية السابقة نجد المرنم قد اكتشف أن الوصية تكشف له خداعات الشياطين فينجو، لقد اكتشف في كلام الله كنزًا ثمينًا، فهو يعزيه ويشدده ويكشف له خداعات إبليس. وهذه طبيعة كلمة الله، فكل يوم نجد فيها غذاء جديد وشفاء جديد. ربما نفس الآية نقرأها على فترات وفي كل مرة نجد فيها معنى جديد مشبع ومعزي، ونجد أنها تكشف لنا معنى جديد لحب الله بل تكشف لنا عن المسيح نفسه ويكون هذا سر تعزيتنا وفرحنا الحقيقي أننا نعرفه. أما أي كمال آخر في العالم فمهما كان فهو محدود. وهذا ما علم به المسيح أن نبني بيتنا علي الصخر وليس علي الرمال (مت 7: 24-27).

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