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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القمص أنطونيوس فكري

مزمور 76 - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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هذا المزمور استمرار لنفس الفكر في المزمور السابق وهو دينونة الله لكل الأرض والترجمة السبعينية تعنون المزمور بأنه قيل بعد الانتصار على أشور يوم ضرب ملاك الرب 185,000 من جيش أشور. وعمومًا في ترتيل هذا المزمور نذكر أعمال الله المجيدة مع كنيسته دائمًا. وأهم عمل هو الفداء والانتصار على الشيطان، الذي كانت كل الانتصارات في العهد القديم رمزًا للانتصار عليه.

 

الآيات (1-3): "الله معروف في يهوذا اسمه عظيم في إسرائيل. كانت في ساليم مظلته ومسكنه في صهيون. هناك سحق القسي البارقة. المجن والسيف والقتال. سلاه."

اَللهُ مَعْرُوفٌ فِي يَهُوذَا = بعجائبه حيث أسكنهم في ديارهم وهزم لهم كل أعداءهم، وإسمه معروف في يهوذا لأن الهيكل في يهوذا. واسْمُهُ عَظِيمٌ فِي إِسْرَائِيلَ = إسرائيل هي باقي الأسباط التي جمعها داود الملك في أمة واحدة.  

وبعد سبي أشور لمملكة إسرائيل، تحولت إسرائيل لشعب عبادته هي خليط من اليهودية والوثنية فصارت إسرائيل رمزاً للأمم، وبهذا فالآية تشير للمسيح الذي جمع اليهود والأمم، وهذا يظهر من جمع إسرائيل مع يهوذا في الآية الأولي. فيكون أن داود حين وحَّدَ يهوذا مع إسرائيل كان هذا رمزا للمسيح ابن داود الذي وحَّد اليهود والأمم في جسده الواحد.

والله عمله معروف مع أبناء إسرائيل. كَانَتْ فِي سَالِيمَ مِظَلَّتُهُ = أي خيمة الاجتماع حيث سكن الله وسط شعبه، ثم الهيكل فيما بعد. وحول أسوار أورشليم سقط أعداءها من جيش أشور= هُنَاكَ سَحَقَ الْقِسِيَّ الْبَارِقَةَ. وما قاله المرنم هنا هو نبوة عن عمل المسيح على صليبه، فقد صلب في أورشليم. وهو صلب بجسده أي مِظَلَّتُهُ أو خيمته، فالخيمة تشير للجسد (2كو1:5). وبصليبه سحق إبليس = هُنَاكَ سَحَقَ الْقِسِيَّ الْبَارِقَةَ . وصار اسمه عظيماً في كنيسته للأبد على ما عمله لها من خلاص عجيب. وإبليس رمزه هنا أشور.

 

الآيات (4، 5): "أبهى أنت امجد من جبال السلب. سلب أشداء القلب. ناموا سنتهم. كل رجال البأس لم يجدوا أيديهم."

جِبَالِ السَّلَبِ = هم جيش أشور وشبههم بالجبال لقوتهم وكبريائهم ولكنهم أقوياء في السلب والنهب. والله أقوى من أقوى ممالك الأرض= أَمْجَدُ مِنْ جِبَالِ السَّلَبِ فهم أتوا ليسلبوا شعب الله، ولكنهم تحولوا إلى غنيمة = سُلِبَ أَشِدَّاءُ الْقَلْبِ. لقد ضربهم ملاك الله، فلم يقوموا= نَأمُوا سِنَتَهُمْ = لقد ناموا ليلاً وكانوا ينتظرون أنه حين يستيقظون صباحاً يفترسوا أورشليم. فصاروا أمواتا، بل سلبهم شعب إسرائيل في الصباح وحملوا مما معهم غنيمة وافرة. وهذا ما حدث مع الشياطين. لَمْ يَجِدُوا أَيْدِيَهُمْ = إنحلت قوتهم إذ ربطهم المسيح بسلسلة لمدة 1000عام.

 

آية (6): "من انتهارك يا إله يعقوب يسبخ فارس وخيل."

حين انتهرهم الله صار موت فرسانهم وخيولهم. كما حدث مع فرعون من قبل. يسبخ= يُصرع وتترجم نوم عميق أو غيبوبة أو فقدان للوعي.

 

الآيات (7-9): "أنت مهوب أنت. فمن يقف قدامك حال غضبك. من السماء أسمعت حكمًا. الأرض فزعت وسكتت. عند قيام الله للقضاء لتخليص كل ودعاء الأرض. سلاه."

أحكام الله ضد الأشرار معروفة منذ القديم، وأحكامه مخيفة، تصدر من السماء فلا يقف أحد في وجه أحكامه (الطوفان، حريق سدوم، ضربات مصر..) وكانت كل ضربات الأشرار في العهد القديم رمزًا لضربة الشيطان بالصليب ليخلص الله شعبه.

 

آية (10): "لأن غضب الإنسان يحمدك. بقية الغضب تتمنطق بها."

لأن غضب الإنسان يحمدك= غضب الإنسان يسبب مجدًا للرب. فجيش أشور غضب على شعب الله فتحول غضبهم إلى مجد اسم الله حين تمجد بهم (وتفهم أن غضب الإنسان المقدس ضد الخطية يسبب حمدًا وتسبيحًا للرب عد7:25، 8). وغضب الإنسان ضد الله هو غضب عاجز، فلن يستطيع إنسان أن ينال من الله شيئًا، بل الله يطيل أناته على هذا الغضوب ثم يتمجد فيه. بقية الغضب تتمنطق بها= وفي الإنجليزية "بقية الغضب سوف تكبح بها". ما لم يتحول لمجده وتسبيحه من غضب الشرير حين يتمجد الله فيه سوق يتمنطق الله به، أي يقوم ليعمل، ويستعد لكبح جماح الشرير، وهذا قد فعله مع بقية جيش أشور الذين هربوا وصاروا سخرية للجميع. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). والمسيح بصليبه تمجد وسط كنيسته، ولكن مازالت بقية للغضب هو يتمنطق بها حتى يلقيه نهائيًا في البحيرة المتقدة بالنار وللأبد. والآن هو يكبح جماحه ويبعده عن كنيسته.

 

الآيات (11، 12): "انذروا وأوفوا للرب إلهكم يا جميع الذين حوله. ليقدموا هدية للمهوب. يقطف روح الرؤساء. هو مهوب لملوك الأرض."

دعوة لنوفي نذورنا فهو قد نجانا. يقطف روح الرؤساء= أي ينزع شجاعتهم وكبريائهم. وفي اليوم الأخير يوم الدينونة يلقيهم في عذاب أبدي (رؤ18:14، 19) ليقدموا هدية للمهوب= الرب يفرح بهدايا مثل التوبة والصلاة والتسبيح والإيمان.

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