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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القمص أنطونيوس فكري

مزمور 63 (62 في الأجبية) - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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رتل داود هذا المزمور وهو هارب من شاول الملك في برية يهوذا بجانب نهر الأردن. ويعبر فيه عن اشتياقه لله الذي هو الآن محروم من هيكله وعبادته أثناء هروبه.

 

آية (1): "يا الله إلهي أنت إليك أبكر عطشت إليك نفسي يشتاق إليك جسدي في أرض ناشفة ويابسة بلا ماء."

يا الله إلهي= التكرار يعبر عن الاشتياق وقوله إلهي تعبر عن العلاقة الشخصية بين الله وبينه في حب (نش3:6)..الله =هو إله الكون كله ..الهي= هذه عن العلاقة الخاصة بين داود والله.    إليك أبكر= اشتياقه لله يجعله يبكر ليصلي. عطشت إليك نفسي. يشتاق إليك جسدي داود هنا أمامه برية قاحلة لا ماء فيها، فتأمل في هذا المنظر ورآها برية بدون ثمار ولا حياة. فقال وأنا هكذا بدونك يا رب بلا حياة وبلا ثمار. وهكذا كل إنسان بدون الروح القدس الماء المحيي يكون بلا ثمار (يو14:4 + غل22:5 + يو37:7-39) وهنا داود يشعر بهذا العطش فيصلي ليرويه الله. هو شعر أنه بدون الله مثل هذه البرية. وراجع (لو24:11-26). فالروح النجس يسكن في أماكن ليس فيها ماء. وهذا ما حدث مع شاول الملك فحينما فارقه روح الرب دخل فيه روح رديء (1صم14:16). ونصلي هذا المزمور في باكر، لأننا في باكر نبكر للصلاة طالبين الله مشتاقين وعطشانين.

 

آية (2): "لكي أبصر قوتك ومجدك كما قد رأيتك في قدسك."

هو اشتياق داود أن يعاين مجد الله في البرية كما عاينه سابقًا في الهيكل. أو هو اشتياقه أن يعود لهيكل الله (الخيمة). لقد كان اشتياق داود دائمًا أن يسكن في هيكل الله ويتفرس في هيكله المقدس (مز4:27).

لكي أبصر قوتك= المسيح هو قوة الله (1كو24:1) فتكون هذه نبوة واشتياق لأن يرى المسيح. وكان المسيح في ضعفه أثناء أحداث الصلب كبرية قاحلة ولكن ظهرت فيه قوة الله (أش1:53-3). بهذا نفهم من الآيات (1، 2) أن المرنم يشتاق لعمل المسيح الفدائي الذي به يتحول جسدنا المائت والذي هو كأرض ناشفة بلا ماء إلى هيكل للروح القدس له ثماره.

 

آية (3): "لأن رحمتك أفضل من الحيوة. شفتاي تسبحانك."

رحمة الله أفضل من الحياة بكل ملذاتها وغناها ، فمع الملذات هنا ك آلام وبدون الله لا يمكن احتمال آلام الحياة بالرغم من الملذات التي فيها.

 

آية (4): "هكذا أباركك في حياتي. باسمك أرفع يدي."

حينما تأمل في مراحم الله سبح الله وباركه ورفع يديه (كما رفع موسى يديه فغلبوا).

 

آية (5): "كما من شحم ودسم تشبع نفسي وبشفتي الابتهاج يسبحك فمي."

الشحم والدسم يشبعان الجسد والتسبيح يشبع النفس ويلذذها (أش6:25).والشبع معناه ع انعدام الاحتياج لغير الله.

 

آية (6): "إذا ذكرتك على فراشي. في السهد ألهج بك."

نجد داود يسبح الله. فِي السُّهْدِ = السهد هو الأرق. "الأسحار" (السبعينية) الأسحار هي أوقات ما قبل الفجر. والمعني انه لو شعر بأرق وإستيقظ قبل الفجر فهو يسبح ويردد اسم الله. إذاً هو لا يسبح الله باكرا فقط بل كل اليوم "صلوا بلا انقطاع" (1تي17:5). وهو لا يستطيع أن يضع رأسه على سريره إن لم يجد موضعاً للرب (مز 132: 3 -5)، فهو في حالة اتصال وحديث مع الله باستمرار.

 

آية (7): "لأنك كنت عونًا لي وبظل جناحيك أبتهج."

لاحظ أنه يشكر الله على معونته، وبأنه يستظل بستر جناحي الرب أي رحمته وعنايته بينما هو هارب في البرية من وجه شاول (مت37:23). من الواضح أن الله لم يتركه بل أظهر له قوته وعزاه في ضيقته، كما ظهر مع الثلاث فتية في أتون النار وكما ظهرت الرؤيا ليوحنا وهو منفي في بطمس.

 

آية (8): "التصقت نفسي بك. يمينك تعضدني."

هو لا يصلي بلا انقطاع فقط بل يلتصق بالله، فهو لا يجد سلامًا إلا في ذلك.

 

الآيات (9، 10): "أما الذين هم للتهلكة يطلبون نفسي فيدخلون في أسافل الأرض. يدفعون إلى يدي السيف. يكونون نصيبًا لبنات آوى."

أما الذين هم للتهلكة= أعداء داود وأعداء الله والكنيسة وكل مقاوم لله عوضًا عن أن يتمتع بجناحي الله يحتمي تحتهما، يكون بيته خرابًا (مت38:23). (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). ولاحظ أن هؤلاء الأعداء يريدون قتل داود = يطلبون نفسي. من المؤكد إن كان داود تحت ظل جناحي الله فلن تنجح مؤامراتهم، بل هم الذين سوف يهلكون = يدفعون إلى يدي السيف هنا على الأرض وسيهلكون في أبديتهم= يدخلون في أسافل الأرض (هامان ومردخاي).

ويكونون نصيبًا لبنات آوى= هم تركوا أنفسهم للأسد الزائر يفترسهم (1بط8:5) والأسد بعد أن يصطاد فريسته ويأكل منها ما يريده يترك بقية الفريسة للثعالب تأكل الفضلات. لقد صاروا خرابًا تامًا. ومن يسقط في أيدي الشياطين يسهل إصطياده عن طريق الثعالب العديدة الخبيثة (شياطين / بشر أشرار).

 

آية (11): "أما الملك فيفرح بالله. يفتخر كل من يحلف به. لأن أفواه المتكلمين بالكذب تسد."

الملك هو داود. نصيبه الفرح بسبب اتكاله على الله. وسينصره الله فيفتخر به.

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