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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القس أنطونيوس فكري

مزمور 10 - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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آية (1): "يا رب لماذا تقف بعيدًا. لماذا تختفي في أزمنة الضيق."

سؤال يتساءله الأبرار دائماً. لماذا لا يظهر الله قوته حينما يضطهد الأشرار أولاده ، بل يترك الله الشرير دون عقاب. (مز73 + إر1:12) بل هذا السؤال هو محور سفر أيوب. بل الشرير ينمو ويزداد شره. لكن الله طويل الأناة.

 

آية (2): "في كبرياء الشرير يحترق المسكين. يؤخذون بالمؤامرة التي فكروا بها."

هنا نرى البار ينسحق من ظلم الشرير. وهذا التساؤل يدل على نفاذ صبر الإنسان. ولكن السيد المسيح يقول "من يصبر إلى المنتهى فذاك يخلص" فكل تجربة للبار هي لمنفعته فبها يزداد إيمانه وصبره ورجاؤه. والحقيقة أن الله لا يبتعد عنا وقت الضيقة لكن ما يحدث أنه نتيجة لقلة إيماننا نشعر بهذا فنشكو. والعكس هو الصحيح فالله يحيط بنا وقت ضيقتنا ونكتشف هذا في خلوة الصلاة ودراسة الكتاب (الثلاثة فتية في الأتون) وحينما تكتشف النفس وجود الله تنتهي حالة القلق والاضطراب والشك.

ويرى كثيرون أن مواصفات الشرير هنا تنطبق على ضد المسيح في آخر الأزمنة. ونرى المبدأ أن من حفر حفرة لأخيه يسقط فيها= يؤخذون بالمؤامرة التي فكروا بها.

 

الآيات (3-11): "لأن الشرير يفتخر بشهوات نفسه. والخاطف يجدف يهين الرب. الشرير حسب تشامخ انفه يقول لا يطالب. كل أفكاره أنه لا إله. تثبت سبله في كل حين. عالية أحكامك فوقه. كل أعدائه ينفث فيهم. قال في قلبه لا أتزعزع. من دور إلى دور بلا سوء. فمه مملوء لعنة وغشًا وظلمًا. تحت لسانه مشقة وإثم. يجلس في مكمن الديار في المختفيات يقتل البري. عيناه تراقبان المسكين. يكمن في المختفى كأسد في عرّيسه. يكمن ليخطف المسكين. يخطف المسكين بجذبه في شبكته. فتنسحق وتنحني وتسقط المساكين ببراثنه. قال في قلبه أن الله قد نسي. حجب وجهه. لا يرى إلى الأبد."

نرى فيها تصورات قلب الأشرار أو إبليس أو ضد المسيح، فهو متكبر، يفتخر بصنع الشر والتجديف على الله والإلحاد فهو يقول لا إله، وإن وجد إله فهو لاَ يُطَالِبُ = أي لا يعاقب، أو أنه ينسى شروره. وهو واثق في نفسه. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). وعموماً فالكبرياء يؤدي لكل هذا. تَثْبُتُ سُبْلُهُ فِي كُلِّ حِينٍ = الله لا يعاقب فورا. عَالِيَةٌ أَحْكَأمُكَ فَوْقَهُ = في نظر المظلوم أن الشرير تثبت طرقه أي لا يجد مقاومة. ولكن المرنم يضيف أن هذا بسماح من الله وبحكمة تعلو على فهمه . والله لأنه فوق هذا الشرير بقوته وحكمته يسمح بذلك إلى حين وليس في كل حين. تَحْتَ لِسَانِهِ مَشَقَّةٌ = مشقة = أي عناء ووجع "فلا سلام للأشرار" (سبعينية)، فكلامه يسبب ألاما لمن يقبلها ولمن يقولها ولمن يعلمها، بل ولكل شرير.

وإبليس كان يختفي وراء لسان الهراطقة. وهو يكمن في الهراطقة = المختفى ليخدع بهم البسطاء. وهو يحارب بقوة كَأَسَدٍ فِي عِرِّيسِهِ = عرينه. لقد قيل عن ضد المسيح أنه "مرتفع على كل ما يدعي إلهاً" (2تس4:2). فإبليس أعطاه كل قوته وشره (رؤ2:13).

 

الآيات (12-18): "قم يا رب. يا الله ارفع يدك. لا تنس المساكين. لماذا أهان الشرير الله. لماذا قال في قلبه لا تطالب. قد رأيت لأنك تبصر المشقة والغم لتجازي بيدك. إليك يسلم المسكين أمره. أنت صرت معين اليتيم. أحطم ذراع الفاجر. والشرير تطلب شرّه ولا تجده. الرب ملك إلى الدهر والأبد بادت الأمم من أرضه. تأوه الودعاء قد سمعت يا رب. تثبت قلوبهم. تميل أذنك. لحق اليتيم والمنسحق لكي لا يعود أيضًا يرعبهم إنسان من الأرض."

هي صرخة من المرنم ومن كل مظلوم ومن الكنيسة ليتدخل الله الذي يبدو كما لو كان نائماً في السفينة (مت25:8). فالكنيسة وهي تتألم تشبه هذه السفينة التي تلاطمها الأمواج. قُمْ = هنا الكنيسة تطلب سرعة مجيء الرب الديان. ونلاحظ تكرار كلمات "المسكين واليتيم والمتواضع" وهي تشير للكنيسة ككل أو للنفس. فالنفس التي تشعر بأنها يتيمة تسمع الله يقول لها صلوا هكذا "يا أبانا الذي في السموات" والنفس التي تشعر بأنها مسكينة تسمع "طوبى للمساكين" "لن أترككم يتامي لكن أرسل لكم الروح المعزي".

قُمْ يا رب = الذي يقوم فهو يتهيأ ليعمل والكنيسة تصلي لله ليعمل علي إبادة الشر.

نلاحظ إرتفاع فكر داود عن فكر أيوب، فكلاهما لاحظا أن الشرير يظلم البار، لكن بينما لام أيوب الله على ذلك، نجد داود يقابل هذا بالصلاة واثقا أن هذا الإرتفاع هو إلى حين، وأن الله هو سند للمظلوم وقت ضيقته وفي النهاية سيدين الشرير. لذلك نجد أن سفر المزامير هو درجة روحية أعلى من سفر أيوب فيها يعلمنا داود النبي أن نقابل التجارب بالصلاة والصراخ إلى الله، والله يسندنا ويعزينا إلى أن تأتى التجربة بالثمار المطلوبة ثم يزيح الله الشرير وتنتهى التجربة.

اِحْطِمْ ذِرَاعَ الْفَاجِرِ. وَالشِّرِّيرُ تَطْلُبُ شَرَّهُ وَلاَ تَجِدُهُ = إضرب هذا الشرير الفاجر حتى يختفي شره من الوجود.

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