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شرح الكتاب المقدس - العهد القديم - القمص أنطونيوس فكري

مزمور 119 (118 في الأجبية) - قطعة هـ - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير لـ داؤود (مزامير داود):
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قطعة (ه) ترتيب الحياة طبقًا للوصية

 

آية (33): "علّمني يا رب طريق فرائضك فاحفظها إلى النهاية."

حينما سار وجري في الطريق، خاف أن يرتد لضعفه وهنا يطلب من الله أن يثبته في الطريق للنهاية. والطريق الروحي يحتاج أن نتعلم فيه من الله، ونكون كتلاميذ أمام معلمهم حتى لا يحدث انحراف. "ولكن من المهم أيضًا أن يكون لنا مرشد وأب اعتراف".

 

آية (34): "فهمني فألاحظ شريعتك واحفظها بكل قلبي."

المرنم يحب أن يفهم الناموس، ويصلي ليعطيه الله فهمًا. وحينما نفهم فائدة الوصية وأنها أعطيت ليكون في تنفيذها حياة. نحفظها من كل القلب، أي برغبة وحب وإصرار.

 

آية (35): "دربني في سبيل وصاياك لأني به سررت."

دربني= "أهدني" في السبعينية. فالإنسان متمرد بطبيعته ويحتاج إلى ترويض وهذا يعمله الله مع كل نفس تريده. وهذا الترويض قد يشمل بعض التجارب والآلام.  لأني به سررت= هنا نرى الاختيار بحرية لطريق الله ونرى أنه غير قادر وحده أن يسلك فيه ويحتاج لتدريب وفهم من الله حتى لا ينحرف.

 

آية (36): "أمل قلبي إلى شهاداتك لا إلى المكسب."

نرى هنا طريق الانحراف الذي يغوى كل نفس تسير في طريق الله وهو أنها تميل إلى المكسب= "الظلم" (سبعينية) أي يظلم المساكين أو يغش ليزداد مكسبه. المكسب في حد ذاته ليس خطية. (انظر المزيد عن هذا الموضوع هنا في موقع الأنبا تكلا في أقسام المقالات والتفاسير الأخرى). والخطية هي في ظلم الآخرين أو أن يصير المكسب في حد ذاته هدفًا للنفس وليس وسيلة يعيش بها الإنسان. والإنسان يجب أن يكون له هدف واحد وهنا يطلب المرنم أن يكون هدفه، أن يميل قلبه إلى شهادات الله= أي ينفذها بحب ومن يميل قلبه لشهادات الله يكره الظلم والطمع ومحبة العالم التي هي عداوة لله (يع4:4). والعكس فمن يحب الطمع ويملأ قلبه من الشهوات العالمية يختفي من قلبه محبة الله (مت24:6). داود هنا بعد أن سار في طريق الله  يعلم أنه لا بُد من وجود عثرات ويطلب المعونة.

 

آية (37): "حول عينيّ عن النظر إلي الباطل. في طريقك أحيني."

متفقة مع آية (36). فأباطيل العالم كثيرة وقد تغرى الإنسان أن ينساق وراءها تاركًا وصايا الله (غني/ جمال/ قوة/ سلطة/ شهوة/ رئاسة/ صيت/ مديح..) فالسعي وراء هذا هو باطل الأباطيل (جا2:1) والسبب أن كل هذا طريقه إلى زوال. ولذلك علينا أن نركز أنظارنا إلى السماء حيث المسيح جالس ينتظرنا أن نغلب.

 

آية (38): "أقم لعبدك قولك الذي لمتقيك."

أي تمم يا رب وعودك الصادقة معي لأنني اتقيتك. هذه جسارة البنين مع أبيهم السماوي، أن يجعلهم آنية كرامة إذ اختاروه بحريتهم.

 

آية (39): "أزل عاري الذي حذرت منه لأن أحكامك طيبة."

العار الذي نرفضه هو أن نسقط في خطية فيعيرنا إبليس بها ويذلنا بسببها. ومن يريد أن يخلص من عار كهذا فليسلك بوصايا الله فإنها حلوة= أحكامك طيبة= ولا يلحقه عار.

 

آية (40): "هأنذا قد اشتهيت وصاياك. بعدلك أحيني."

حينما تذوق المرنم حلاوة الوصية اشتهاها. وعدل الله المحيي ظهر على الصليب.

 

لاحظ التسلسل الرائع فيما يطلبه المرنم:-

علمني:- هذه هي البداية لإنسان كان لا يعرف شيء عن طريق الله (موسى الأسود مثلًا).

فهمني:- هو سمع وصايا والآن يريد أن يفهم ما فائدة هذه الوصايا. (فترة المناقشات والجدال للمبتدئين).

دربني:- هنا بدأ الجسد يتمرد والمرنم يطلب ترويضه. هذه تشبه التداريب العملية بعد المحاضرات النظرية.

أمل قلبي إلى شهاداتك:- هو يمارس وينفذ الوصايا بالتغصب والآن يريد أن تنفتح عينيه ويكتشف لذتها فينفذها بحريته وليس بالتغصب.

حوِّل عيني عن النظر إلى الباطل:- هذه تشبه المثل الذي قاله الرب عمن وجد لؤلؤة كثيرة الثمن فمضى وباع ما عنده من لآلئ ليشتريها. كان العالم بملذاته يجذبه في الماضي والآن صار يجده نفاية.

وهذا التلذذ بالوصية واكتشاف بطلان الملذات العالمية عبَّر عنه المرنم في الآيات 103، 104 من المزمور نفسه.

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