St-Takla.org  >   bible  >   commentary  >   ar  >   ot  >   church-encyclopedia  >   psalms
 
St-Takla.org  >   bible  >   commentary  >   ar  >   ot  >   church-encyclopedia  >   psalms

تفسير الكتاب المقدس - العهد القديم - الموسوعة الكنسية لتفسير العهد القديم: كنيسة مارمرقس بمصر الجديدة

مزمور 119 (118 في الأجبية) - قطعة ع - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير ل داؤود (مزامير داوود):
تفسير سفر مزمور: فهرس المزامير بالرقم | مقدمة سفر المزاميرمزمور 1 | مزمور 2 | مزمور 3 | مزمور 4 | مزمور 5 | مزمور 6 | مزمور 7 | مزمور 8 | مزمور 9 | مزمور 10 | مزمور 11 | مزمور 12 | مزمور 13 | مزمور 14 | مزمور 15 | مزمور 16 | مزمور 17 | مزمور 18 | مزمور 19 | مزمور 20 | مزمور 21 | مزمور 22 | مزمور 23 | مزمور 24 | مزمور 25 | مزمور 26 | مزمور 27 | مزمور 28 | مزمور 29 | مزمور 30 | مزمور 31 | مزمور 32 | مزمور 33 | مزمور 34 | مزمور 35 | مزمور 36 | مزمور 37 | مزمور 38 | مزمور 39 | مزمور 40 | مزمور 41 | مزمور 42 | مزمور 43 | مزمور 44 | مزمور 45 | مزمور 46 | مزمور 47 | مزمور 48 | مزمور 49 | مزمور 50 | مزمور 51 | مزمور 52 | مزمور 53 | مزمور 54 | مزمور 55 | مزمور 56 | مزمور 57 | مزمور 58 | مزمور 59 | مزمور 60 | مزمور 61 | مزمور 62 | مزمور 63 | مزمور 64 | مزمور 65 | مزمور 66 | مزمور 67 | مزمور 68 | مزمور 69 | مزمور 70 | مزمور 71 | مزمور 72 | مزمور 73 | مزمور 74 | مزمور 75 | مزمور 76 | مزمور 77 | مزمور 78 | مزمور 79 | مزمور 80 | مزمور 81 | مزمور 82 | مزمور 83 | مزمور 84 | مزمور 85 | مزمور 86 | مزمور 87 | مزمور 88 | مزمور 89 | مزمور 90 | مزمور 91 | مزمور 92 | مزمور 93 | مزمور 94 | مزمور 95 | مزمور 96 | مزمور 97 | مزمور 98 | مزمور 99 | مزمور 100 | مزمور 101 | مزمور 102 | مزمور 103 | مزمور 104 | مزمور 105 | مزمور 106 | مزمور 107 | مزمور 108 | مزمور 109 | مزمور 110 | مزمور 111 | مزمور 112 | مزمور 113 | مزمور 114 | مزمور 115 | مزمور 116 | مزمور 117 | مزمور 118 | مزمور 119 - مقدمة مز 119 - (قطعة: أ - ب - ج - د - ه - و - ز - ح - ط - ي - ك - ل - م - ن - س - ع - ف - ص - ق - ر - ش - ت) | مقدمة مزامير المصاعد | مزمور 120 | مزمور 121 | مزمور 122 | مزمور 123 | مزمور 124 | مزمور 125 | مزمور 126 | مزمور 127 | مزمور 128 | مزمور 129 | مزمور 130 | مزمور 131 | مزمور 132 | مزمور 133 | مزمور 134 | مزمور 135 | مزمور 136 | مزمور 137 | مزمور 138 | مزمور 139 | مزمور 140 | مزمور 141 | مزمور 142 | مزمور 143 | مزمور 144 | مزمور 145 | مزمور 146 | مزمور 147 | مزمور 148 | مزمور 149 | مزمور 150 | مزمور 151 | ملخص عام لسفر المزامير

نص سفر مزمور: مزمور 1 | مزمور 2 | مزمور 3 | مزمور 4 | مزمور 5 | مزمور 6 | مزمور 7 | مزمور 8 | مزمور 9 | مزمور 10 | مزمور 11 | مزمور 12 | مزمور 13 | مزمور 14 | مزمور 15 | مزمور 16 | مزمور 17 | مزمور 18 | مزمور 19 | مزمور 20 | مزمور 21 | مزمور 22 | مزمور 23 | مزمور 24 | مزمور 25 | مزمور 26 | مزمور 27 | مزمور 28 | مزمور 29 | مزمور 30 | مزمور 31 | مزمور 32 | مزمور 33 | مزمور 34 | مزمور 35 | مزمور 36 | مزمور 37 | مزمور 38 | مزمور 39 | مزمور 40 | مزمور 41 | مزمور 42 | مزمور 43 | مزمور 44 | مزمور 45 | مزمور 46 | مزمور 47 | مزمور 48 | مزمور 49 | مزمور 50 | مزمور 51 | مزمور 52 | مزمور 53 | مزمور 54 | مزمور 55 | مزمور 56 | مزمور 57 | مزمور 58 | مزمور 59 | مزمور 60 | مزمور 61 | مزمور 62 | مزمور 63 | مزمور 64 | مزمور 65 | مزمور 66 | مزمور 67 | مزمور 68 | مزمور 69 | مزمور 70 | مزمور 71 | مزمور 72 | مزمور 73 | مزمور 74 | مزمور 75 | مزمور 76 | مزمور 77 | مزمور 78 | مزمور 79 | مزمور 80 | مزمور 81 | مزمور 82 | مزمور 83 | مزمور 84 | مزمور 85 | مزمور 86 | مزمور 87 | مزمور 88 | مزمور 89 | مزمور 90 | مزمور 91 | مزمور 92 | مزمور 93 | مزمور 94 | مزمور 95 | مزمور 96 | مزمور 97 | مزمور 98 | مزمور 99 | مزمور 100 | مزمور 101 | مزمور 102 | مزمور 103 | مزمور 104 | مزمور 105 | مزمور 106 | مزمور 107 | مزمور 108 | مزمور 109 | مزمور 110 | مزمور 111 | مزمور 112 | مزمور 113 | مزمور 114 | مزمور 115 | مزمور 116 | مزمور 117 | مزمور 118 | مزمور 119 | مزمور 120 | مزمور 121 | مزمور 122 | مزمور 123 | مزمور 124 | مزمور 125 | مزمور 126 | مزمور 127 | مزمور 128 | مزمور 129 | مزمور 130 | مزمور 131 | مزمور 132 | مزمور 133 | مزمور 134 | مزمور 135 | مزمور 136 | مزمور 137 | مزمور 138 | مزمور 139 | مزمور 140 | مزمور 141 | مزمور 142 | مزمور 143 | مزمور 144 | مزمور 145 | مزمور 146 | مزمور 147 | مزمور 148 | مزمور 149 | مزمور 150 | مزمور 151 | المزامير كامل

الكتاب المقدس المسموع: استمع لهذا الأصحاح

← اذهب مباشرةً لتفسير الآية: 121 - 122 - 123 - 124 - 125 - 126 - 127 - 128

St-Takla.org                     Divider of Saint TaklaHaymanot's website فاصل - موقع الأنبا تكلاهيمانوت

القطعة السادسة عشر (ع)

الثبات وحفظ الوصية (ع 121-128):

الهدف:

بعد اختبار البار لمساندة الله يطلب منه أن يحميه من الأشرار، ويرحمه، ويعرفه كلامه، فيحبه ويحيا به في الطريق المستقيم.

St-Takla.org                     Divider of Saint TaklaHaymanot's website فاصل - موقع الأنبا تكلاهيمانوت

ع121: أَجْرَيْتُ حُكْمًا وَعَدْلًا. لاَ تُسْلِمْنِي إِلَى ظَالِمِيَّ.

  1. سار داود الملك في طريق الله، وثبت العدل في مملكته وفي أحكامه، من أجل مخافته لله، كما انتهت القطعة السابقة. ويتضرع إلى الله هنا أن يحيمه، ولا يترك الأشرار الظالمين يسيئون إليه، ويظلمونه، بل يعامله الله بالعدل لأن الله عادل ورحيم.

  2. داود هنا لا يتكبر عندما يقول قد أجريت العدل، بل يتوسل إلى الله العادل الذي يفهمه ليحميه من الظالمين، خاصة وأنه حاول تطبيق وصايا الله وعدله، فيطلب مراحم الله.

 

ع122: كُنْ ضَامِنَ عَبْدِكَ لِلْخَيْرِ، لِكَيْلاَ يَظْلِمَنِي الْمُسْتَكْبِرُونَ.

  1. يطلب داود من الله باتضاع أن يشمله برعايته، فيضمن له الخير برحمته، حتى لا يظلمه الشياطين وتابعيهم الأشرار الظالمين. فهو يشعر بضعفه أمام قوة الأشرار ولا ضمان له إلا حماية الله.

  2. هذه الآية نبوة عن المسيح الفادي الذي يقدم لنا الخلاص ويضمن لنا الخير، ويخلصنا من أيدي الشياطين المتكبرين.

 

ع123: كَلَّتْ عَيْنَايَ اشْتِيَاقًا إِلَى خَلاَصِكَ وَإِلَى كَلِمَةِ بِرِّكَ.

كلَّت: تعبت

  1. داود ينتظر خلاص الله، ويرفع صلوات مستمرة، بل وتنسكب عيناه في دموع كثيرة؛ حتى كلت عيناه، ولكنه لم ييأس، وظل منتظرًا كلام الله الذي يساعده على حياة البر، فهو مشتاق إلى الله، ولا يستطيع أن يحيا بدون كلامه.

  2. رفع داود عينيه بروح النبوة، منتظرًا الخلاص الذي يتممه المسيح في ملء الزمان على الصليب، ويرى الكلمة البار القدوس يفدي البشرية، فيفرح قلوب كل من انتظروه في العهد القديم، وكذلك المؤمنين به في العهد الجديد.

 

ع124، 125: اصْنَعْ مَعَ عَبْدِكَ حَسَبَ رَحْمَتِكَ، وَفَرَائِضَكَ عَلِّمْنِي. عَبْدُكَ أَنَا. فَهِّمْنِي فَأَعْرِفَ شَهَادَاتِكَ.

  1. باتضاع يطلب داود عناية الله ورعايته له بحسب رحمة الله، وليس حسب استحقاقه؛ إذ يشعر أنه لا يستحق شيئًا لأجل كثرة خطاياه. وهو مشتاق أن ينال فهمًا روحيًا؛ ليتمسك بعبادة الله التي هي فرائضه، وكذا شهاداته التي هي كلامه.

  2. على قدر ما يطلب الإنسان من الله أن يعطيه فهمًا تنسكب عليه مراحم الله وحكمته. فالله يعطي لأولاده بحسب إحساسهم بالاحتياج إليه، وإيمانهم به، ومحبتهم له الظاهرة في صلوات كثيرة.

وستجد تفاسير أخرى هنا في موقع الأنبا تكلا هيمانوت لمؤلفين آخرين.

 

St-Takla.org Image: A Levite Priest reading the law to the people: ‘I love your commandments more than the finest gold. Every law of God is right, whatever it concerns. I hate every other way’ (Psalm 119:127, 128). - Psalms, Bible illustrations by James Padgett (1931-2009), published by Sweet Media صورة في موقع الأنبا تكلا: كاهن لاوي يقرأ الشريعة للشعب: "لأجل ذلك أحببت وصاياك أكثر من الذهب والإبريز. لأجل ذلك حسبت كل وصاياك في كل شيء مستقيمة. كل طريق كذب أبغضت" (المزامير 119: 127-128) - صور سفر المزامير، رسم جيمز بادجيت (1931-2009)، إصدار شركة سويت ميديا

St-Takla.org Image: A Levite Priest reading the law to the people: ‘I love your commandments more than the finest gold. Every law of God is right, whatever it concerns. I hate every other way’ (Psalm 119:127, 128). - Psalms, Bible illustrations by James Padgett (1931-2009), published by Sweet Media

صورة في موقع الأنبا تكلا: كاهن لاوي يقرأ الشريعة للشعب: "لأجل ذلك أحببت وصاياك أكثر من الذهب والإبريز. لأجل ذلك حسبت كل وصاياك في كل شيء مستقيمة. كل طريق كذب أبغضت" (المزامير 119: 127-128) - صور سفر المزامير، رسم جيمز بادجيت (1931-2009)، إصدار شركة سويت ميديا

ع126: إِنَّهُ وَقْتُ عَمَل لِلرَّبِّ. قَدْ نَقَضُوا شَرِيعَتَكَ.

  1. شعر داود بابتعاد الناس عن شريعة الله وناموسه، إذ انغمسوا في خطايا كثيرة. فغار غيرة الله، وشعر أنه ينبغي أن يُعمل بكل سرعة وقوة لإعلان اسم الله وإعادة النفوس إليه، أي ضرورة الخدمة والتبشير باسم الله؛ لإعادة أولاده إليه.

  2. يقول داود هذه الآية بروح النبوة عن المسيح، أي أن المسيح يقول في ملء الزمان أنه وقت يُعمل فيه للرب، أي يقدم نفسه على الصليب بعد أن كرز، وعمل معجزات كثيرة؛ لجذب النفوس البعيدة التي تركت شريعة الله.

 

ع127، 128: لأَجْلِ ذلِكَ أَحْبَبْتُ وَصَايَاكَ أَكْثَرَ مِنَ الذَّهَبِ وَالإِبْرِيزِ. لأَجْلِ ذلِكَ حَسِبْتُ كُلَّ وَصَايَاكَ فِي كُلِّ شَيْءٍ مُسْتَقِيمَةً. كُلَّ طَرِيقِ كَذِبٍ أَبْغَضْتُ.

الإبريز: الذهب الخالص

  1. أحب داود وصايا الله، فعمل بها، وجعلت حياته مستقيمة، وأبعدته عن طرق الكذب والشر. فأبغض الطرق الشريرة المنحرفة، وازداد كل يوم تمسكًا بوصايا الله لأنها مستقيمة، وتقوم وتصحح حياته كلما عاش بها.

  2. عندما أحب داود وصايا الله ساعده هذا على تطبيقها، خاصة وأنه أحبها أكثر من الذهب الذي تعمل منه أثمن الأصنام. فعبادة الله فوق جميع العبادات والآلهة. وأيضًا وصايا الله أفضل من كل شهوات العالم و مادياته حتى الثمين منها، مثل الذهب.

اليوم يوم مقبول والساعة ساعة خلاص، فليتك تقوم؛ لتحيا في وصايا الله، فتختبرها، وتتمتع بها، فتستطيع حينئذ أن تعلمها لمن حولك لأنهم ابتعدوا عن الله وكلامه وانغمسوا في شهوات العالم، وفي حاجة شديدة أن يروا صورة حية لأولاد الله الذين يعيشون بكلامه.

St-Takla.org                     Divider فاصل - موقع الأنبا تكلاهيمانوت

← تفاسير أصحاحات مزامير: مقدمة | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 | 17 | 18 | 19 | 20 | 21 | 22 | 23 | 24 | 25 | 26 | 27 | 28 | 29 | 30 | 31 | 32 | 33 | 34 | 35 | 36 | 37 | 38 | 39 | 40 | 41 | 42 | 43 | 44 | 45 | 46 | 47 | 48 | 49 | 50 | 51 | 52 | 53 | 54 | 55 | 56 | 57 | 58 | 59 | 60 | 61 | 62 | 63 | 64 | 65 | 66 | 67 | 68 | 69 | 70 | 71 | 72 | 73 | 74 | 75 | 76 | 77 | 78 | 79 | 80 | 81 | 82 | 83 | 84 | 85 | 86 | 87 | 88 | 89 | 90 | 91 | 92 | 93 | 94 | 95 | 96 | 97 | 98 | 99 | 100 | 101 | 102 | 103 | 104 | 105 | 106 | 107 | 108 | 109 | 110 | 111 | 112 | 113 | 114 | 115 | 116 | 117 | 118 | 119 | 120 | 121 | 122 | 123 | 124 | 125 | 126 | 127 | 128 | 129 | 130 | 131 | 132 | 133 | 134 | 135 | 136 | 137 | 138 | 139 | 140 | 141 | 142 | 143 | 144 | 145 | 146 | 147 | 148 | 149 | 150 | 151

 

الكتاب المقدس المسموع: استمع لهذا الأصحاح


© st-takla.org موقع الأنبا تكلا هيمانوت: بوابة عامة عن عقيدة الكنيسة القبطية الأرثوذكسية، مصر / إيميل:

الكتاب المقدس: بحث، تفاسير | القراءات اليومية | الأجبية | أسئلة | طقس | عقيدة | تاريخ | كتب | شخصيات | كنائس | أديرة | كلمات ترانيم | ميديا | صور | مواقع | اتصل بنا

https://st-takla.org/bible/commentary/ar/ot/church-encyclopedia/psalms/chapter-119-16.html