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تفسير الكتاب المقدس - العهد القديم - الموسوعة الكنسية لتفسير العهد القديم: كنيسة مارمرقس بمصر الجديدة

مزمور 119 (118 في الأجبية) - قطعة ص - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير ل داؤود (مزامير داوود):
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القطعة الثامنة عشر (ص)

العدل والحق (ع 137-144):

الهدف:

بعد اختبار داود أعماق كلمة الله اجتذبت قلبه أيضًا بالحق والعدل الذي فيها، خاصة وسط ظلم البشر بعضهم لبعض، فامتلأ قلبه غيرة، وأحب الوصايا مع شعوره بضعفه، وحاجته أن يتعلم حقوقه، واحتمل الضيقات، لكن ظل متمسكًا بوصايا الله.

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ع137، 138: بَارٌّ أَنْتَ يَا رَبُّ، وَأَحْكَامُكَ مُسْتَقِيمَةٌ. عَدْلًا أَمَرْتَ بِشَهَادَاتِكَ، وَحَقًّا إِلَى الْغَايَةِ.

  1. الله هو البار القدوس، وكلامه مستقيم وعادل وحق. فهو نور وسط ظلمة أفكار البشر وأعمالهم الردية، فالمقياس الذي نرجع إليه هو كلام الله مصدر العدل والحق والقضاء.

  2. يصف الأشرار كلام الله بأنه صعب ولا يمكن تنفيذه، بل يقولون أن أحكام الله غير عادلة؛ لأنه يسمح بالظلم المنتشر في العالم، مع أن كلام الله يحمل كل العدل والحق اللذين لا يستريح الإنسان إلا فيهما. فكل من يؤمن بالله ويتوب عن خطاياه يستنير، فيكتشف أن الله هو مصدر العدل والاستقامة.

 

ع139: أَهْلَكَتْنِي غَيْرَتِي، لأَنَّ أَعْدَائِي نَسُوا كَلاَمَكَ.

  1. أحب داود كلام الله، وتمنى أن يحفظه كل البشر، ويتمتعوا به. ولكن تضايق جدًا لأن الأشرار أعداءه أهملوا كلام الله، وساروا في الشر. فامتلأ قلبه غيرة حسنة على هذه النفوس التي تضيع، ولا تتمتع بالصلاة في بيت الله، ومن كثرة حماسه ثقلت الغيرة الروحية عليه، حتى كادت تهلكه، أي تأثر جدًا بسبب ابتعاد الأشرار عن عبادة الله في بيته.

  2. هذه الآية كررها المسيح عندما كان في الهيكل ورأى الباعة وانشغال الناس بالبيع والشراء واهمالهم للصلاة، فطرد الباعة ووبخ الشعب (يو 2: 17).

 

ع140: كَلِمَتُكَ مُمَحَّصَةٌ جِدًّا، وَعَبْدُكَ أَحَبَّهَا.

ممحص: خالي من الشوائب، أي نقي.

  1. كلام الأشرار باطل وكذب، وهم يتهمون الله بالظلم، والحقيقة يعلنها داود أن كلام الله نقي، فهو الكلام الوحيد في العالم النقي بل ومصدر النقاوة.

  2. أحب داود كلام الله النقي الذي يحفظه فيتنقي قلبه. وعندما يكتب نقاوة القلب يستطيع أن يعاين الله، ويتمتع بعشرته.

وستجد تفاسير أخرى هنا في موقع الأنبا تكلا هيمانوت لمؤلفين آخرين.

 

ع141: صَغِيرٌ أَنَا وَحَقِيرٌ، أَمَّا وَصَايَاكَ فَلَمْ أَنْسَهَا.

  1. داود كان الأصغر في إخوته، فهو باتضاع يشعر أنه صغير وحقير، ولذا تمسك بوصايا الله فلم ينسها، وبهذا صار أعظم ملوك إسرائيل، وقلبه مثل قلب الله. فالاتضاع يجعل الإنسان متمسكًا بوصايا الله.

  2. هذه الآية نبوة عن الأمم الذين سيؤمنون بالمسيح، فيشعرون أنهم صغار ومحتقرون وقوتهم هي في التمسك بوصايا الله، فتفوقوا على اليهود الذين رفضوا الإيمان بالمسيح.

 

ع142: عَدْلُكَ عَدْلٌ إِلَى الدَّهْرِ، وَشَرِيعَتُكَ حَقٌّ.

  1. يشهد داود أن الله عادل وكلامه مصدر العدل وهو الحق نفسه. وبالتالي فهو مرجع المؤمنين في كل أفكارهم وكلامهم وسلوكهم.

  2. المسيح هو كلمة الله، أي الحق، ومصدر العدل، وهو يظل إلى الأبد ينير بنوره للمؤمنين به، فينموا في معرفة الحق.

 

ع143: ضِيْقٌ وَشِدَّةٌ أَصَابَانِي، أَمَّا وَصَايَاكَ فَهِيَ لَذَّاتِي.

في تمسك داود بوصايا الله، قابل ضيقات وشهوات بسبب الأشرار المحيطين به، وظروف الحياة الصعبة. ولكن تمسكه بوصايا الله جعله يختبر لذة عشرة الله، فنسى آلامه، وصار في فرح، فزاد تمسكه بكلام الله.

 

ع144: عَادِلَةٌ شَهَادَاتُكَ إِلَى الدَّهْرِ. فَهِّمْنِي فَأَحْيَا.

يختم داود هذه القطعة بإعلان أن شهادات الله وكلامه عادلة، وثابتة إلى الدهر، أي إلى الأبد. فهي المصدر الدائم للعدل، لذا يترجى الله أن يعطيه فهمًا لها؛ حتى يحيا معه. فحياة الأبرار هي في معرفة وفهم كلام الله، فيحيون باستقامة ونقاوة في هذا العالم، ثم في الدهر الآتي.

ليتك تراجع حياتك على ضوء كلام الله الذي تقرأه كل يوم، فهو مصدر العدل والحق وبهذا تكتشف استقامة أعمالك وكلامك، وتصحح كل انحراف، فتنال رضا الله، بل يهبك معرفته كل يوم.

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