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تفسير الكتاب المقدس - العهد القديم - الموسوعة الكنسية لتفسير العهد القديم: كنيسة مارمرقس بمصر الجديدة

مزمور 119 (118 في الأجبية) - قطعة ح - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير ل داؤود (مزامير داوود):
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القطعة الثامنة (ح)

إرضاء الله نصيبي (ع 57-64):

الهدف:

بعد أن تعزي داود في ضيقته شعر أن الرب هو نصيبه، وحاول إرضاءه بالسلوك في وصاياه، وشكره، وتعلم عبادته.

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ع57: نَصِيبِي الرَّبُّ، قُلْتُ لِحِفْظِ كَلاَمِكَ.

  1. شعر داود أن نصيبه هو الرب، وليس ممتلكات العالم، أو شهواته، وتفرغ لحفظ وصايا الله وتطبيقها في حياته. فهو وإن كان يحيا في العالم، ويقوم بأعمال كثيرة، ولكن هدفه الوحيد واضح أمامه أن يحيا بكلام الله.

  2. سبط لاوي كان نصيبه هو الرب فلم يمتلك في أرض كنعان (تث 18: 1) وكذلك المكرسون في العهد الجديد من الكهنة والرهبان والخدام؛ هؤلاء جميعًا يشبعهم الله بمحبته، ولا يحتاجون للماديات، إذ جعلوا هدفهم حفظ كلام الله لحياتهم، وتوصيله للآخرين.

 

ع58: تَرَضَّيْتُ وَجْهَكَ بِكُلِّ قَلْبِي. ارْحَمْنِي حَسَبَ قَوْلِكَ.

  1. يشعر داود أنه خاطئ، ويريد أن يرضي الله، وتظهر محبته لله في جهاده بكل قلبه، فليس فقط جهاده بأعمال جسدية، بل يصاحبها مشاعر وفكر؛ ليعلن حقًا احتياجه لله، فيتدخل الله بمراحمه حسب وعده أن يقبل أولاده المتأدبين.

  2. إن كان هنا يظهر تكامل عمل الجهاد مع النعمة، ويظهر أيضًا الاتكال على الله في طلب رحمته، ليس بشكل معين، ولكن حسب كلام الله، أي ما يراه الله مناسبًا له يعطيه إياه.

  3. وجه الله يشير إلى المسيح المتجسد، فالله لم يره أحد، ولكن الابن الوحيد الذي في حضن الآب هو خبر. فداود بروح النبوة رأى المسيح، ويحاول إرضاءه بالتوبة والصلاة.

 

ع59، 60: تَفَكَّرْتُ فِي طُرُقِي، وَرَدَدْتُ قَدَمَيَّ إِلَى شَهَادَاتِكَ. أَسْرَعْتُ وَلَمْ أَتَوَانَ لِحِفْظِ وَصَايَاكَ.

من فضائل داود أنه يراجع نفسه دائمًا، فيفكر في الطرق التي يسلكها، أي حياته، وكل انشغالاته، فإن وجد شيئًا منها قد ابتعد به عن الله، يعود بسرعة إلى وصايا الله وشهاداته، فهو لا يطيق الابتعاد عن الله. وهذا يبين:

  1. اهتمام داود بكلمة الله، فهي أساس حياته.

  2. شجاعة داود في تغيير أعماله، واتجاهاته إن انحرفت عن الله.

  3. اهتمامه بالإسراع إلى تصحيح مساره؛ لأنه إن توانى قد لا يستطيع العودة إلى الله، وقد ينسى ما اقتنع به وينجرف مع التيار وانشغالات العالم.

وستجد تفاسير أخرى هنا في موقع الأنبا تكلا هيمانوت لمؤلفين آخرين.

 

ع61: حِبَالُ الأَشْرَارِ الْتَفَّتْ عَلَيَّ. أَمَّا شَرِيعَتُكَ فَلَمْ أَنْسَهَا.

حبال الأشرار هي مقاومتهم لداود، وحيل إبليس، وكل تهديدات بالإساءة إليه. هذه الحبال يمكن أن تعطل أي إنسان عن جهاده الروحي. ولكن قوة داود اكتسبها من تمسكه بشريعة الله، فهي أقوى من كل حبال الأشرار، بل إنها لا شيء أمام قوة كلمة الله، التي اسند عليها داود، وكان يكررها ويلهج بها كل يوم، فلم تبتعد عن ذهنه، بل كانت في قلبه.

 

ع62: فِي مُنْتَصَفِ اللَّيْلِ أَقُومُ لأَحْمَدَكَ عَلَى أَحْكَامِ بِرِّكَ.

  1. انشغل قلب داود بالصلاة طوال اليوم، وعندما نام في الليل لم يستطع أن يترك الصلاة، فقام ليحمد الله، ويشكره على عنايته به، بل لعله لم يدخل إلى فراشه سريعًا، واستمر فترة يصلي حتى وهو على فراشه، فالصلاة قد جذبت قلبه نهارًا وليلًا، والحمد والتسبيح صارا لذته.

  2. إن كان الليل يرمز إلى الضيقات، فداود أيضًا ينهض منها ليشكر الله الذي يحفظه أثناء الضيقة. وإن كان الليل يرمز للسقوط في الخطية، فداود يتوب عنها، ثم يشكر الله الذي رفعه من الخطية للتوبة.

 

ع63: رَفِيقٌ أَنَا لِكُلِّ الَّذِينَ يَتَّقُونَكَ وَلِحَافِظِي وَصَايَاكَ.

  1. أحب داود الرب، وعاش في مخافته حتى أنه أحب كل من يخافونه، وارتبط بهم، ورافقهم ليتشجع بهم، ويشجعهم. وهؤلاء الذين يخافون الله الذي ثبتهم في مخافته هو حفظهم لوصاياه.

  2. الذي يستطيع أن يرافق جميع الذين يتقون الرب هو المسيح، الذي هو رأس الجسد، وكل الذين يخافون الله أعضاء في جسده. فهذه الآية نبوة عن المسيح يقولها داود بلسان المسيح.

 

ع64: رَحْمَتُكَ يَا رَبُّ قَدْ مَلأَتِ الأَرْضَ. عَلِّمْنِي فَرَائِضَكَ.

  1. أدرك داود أن رحمة الله ملأت الأرض كلها، أي غطت كل البشر. فإحسانات الله لكل الناس في الشمس التي تضيء، والهواء الذي يستنشقونه، والأرض التي ثبتها لهم ... ولذا تجاوبًا مع رحمة الله يطلب من الله أن يعلمه عبادته ليصل إليه ويشكره من كل قلبه.

  2. رحمة الله ملأت الأرض كلها من خلال الصليب الذي قدم فداءً للبشرية كلها لكل من يؤمن به، حتى تخرج من شرورها، وتحيا له في عبادة مقدسة في كنيسته.

  3. عندما يتعلم الإنسان فرائض إلهه يصير مثل الله رحيمًا على كل من حوله، وليس فقط الأبرار، فيكون نورًا للعالم، ويرون فيه نور المسيح.

ليت قلبك ينفتح بالحب لكل الناس؛ لتعطيهم مما أعطاه الله لك، فتساندهم وتشجعهم، وتخدمهم بكل وسيلة.

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