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تفسير الكتاب المقدس - العهد القديم - الموسوعة الكنسية لتفسير العهد القديم: كنيسة مارمرقس بمصر الجديدة

مزمور 119 (118 في الأجبية) - قطعة ي - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير ل داؤود (مزامير داوود):
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القطعة العاشرة (ى)

عزاء للمتكلين (ع 73-80):

الهدف:

إذا رأى البار خيرات الله من خلال تأديبه خضع له باتكال وتسليم، فازدادت تعزيات الله له، واستمر في توبته، بل وصار قدوة للأبرار، وسار في طريق الكمال.

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ع73: يَدَاكَ صَنَعَتَانِي وَأَنْشَأَتَانِي. فَهِّمْنِي فَأَتَعَلَّمَ وَصَايَاكَ.

  1. الله صنعني وأنشأني على صورته ومثاله، ولكن الخطية تشوه صورتي، لذا فأنا محتاج دائمًا أن أتعلم وصاياه لتعيدنى إلى صورتي الأولى، وحتى أتعلم وصايا الله أنا محتاج أن أفهم؛ لأن الله خلق لي عقلًا، وعندما أفهم يسهل علي أن أتعلم وصايا الله. هذا الفهم لأعماق الوصية هو من نعمة الروح القدس.

  2. يداك ترمزان إلى الابن والروح القدس فالخلقة والصنع قد اشترك فيها الثالوث القدوس، والصنع أيضًا يرمز للخلقة في شخص آدم، والإنشاء يرمز لولادتي الطبيعية من بطن أمي. واليدان ترمزان لقوة الله، فخلقتي كانت عملًا عظيمًا يفوق جميع الخلائق، وتم بقوة الله. والصنع أيضًا يرمز لولادتي الجسدية، والإنشاء يرمز لولادتي الثانية في سر المعمودية. والصنع أيضًا يرمز لخلق الإنسان من التراب، والإنشاء يرمز إلى نفخة الحياة التي نفخها الله في آدم.

 

ع74: مُتَّقُوكَ يَرَوْنَنِي فَيَفْرَحُونَ، لأَنِّي انْتَظَرْتُ كَلاَمَكَ.

  1. الذين يخافون الله عندما يرون داود يحتمل الآلام والضيقات، وينتظر بإيمان خلاص الرب يفرحون لثباته ويثبتون هم أيضًا في الإيمان، ويتعلمون من داود الثبات، وتسليم حياتهم لله، بل يرون أعمال الله معه، وسلامه الداخلي، فيزداد فرحهم، وتعلمهم منه لأن أعمال داود وهو في الضيقة وينتظر الرب- إذ تتم في هدوء ودون اضطراب وفي اتكال على الله- تكون نورًا لمن حوله.

  2. تظهر هنا شركة المؤمنين مع داود لأن الكل أعضاء في جسد واحد، الكل يحب الله ويخافه، لذا يشعرون بداود المتألم المنتظر الرب. ومحبة هؤلاء المؤمنين الذين يخافون الله تساند داود، وتشجعه.

 

ع75: قَدْ عَلِمْتُ يَا رَبُّ أَنَّ أَحْكَامَكَ عَدْلٌ، وَبِالْحَقِّ أَذْلَلْتَنِي.

إذ خضع داود للضيقة والتأديب، وانتظر خلاص الله، كشف الله له عن عينيه، ووهبه نعمة العلم بمقاصد الله، ففهم أن الله عادل وليس قاسيًا في تأديبه له، وأنه يستحق هذا الذل لأجل خطاياه وتقصيراته. فالله عادل، بل هو الحق ولا يمكن أن يخطئ، وشعر أنه محتاج لهذا الذل حتى يتخلص من ضعفاته، ويزداد تمسكه بالله. وهنا يظهر مدى خضوع داود واتكاله وتسليمه وقبوله تأديب الله، ولذا استنارت عيناه وفهم الحق.

وستجد تفاسير أخرى هنا في موقع الأنبا تكلا هيمانوت لمؤلفين آخرين.

 

ع76، 77: فَلْتَصِرْ رَحْمَتُكَ لِتَعْزِيَتِي، حَسَبَ قَوْلِكَ لِعَبْدِكَ. لِتَأْتِنِي مَرَاحِمُكَ فَأَحْيَا، لأَنَّ شَرِيعَتَكَ هِيَ لَذَّتِي.

  1. بعد أن خضع داود لعدل الله وتأديبه وذله يطلب بدالة البنين رحمة الله، فهي المعزي والمساند الوحيد له، بل هي سر حياته حتى يستطيع أن يجتاز الآلام والتجارب. ولذا يتمسك بوصايا الله، فتسنده، بل تصير لذة له. وهكذا برحمة الله تتحول الضيقة إلى لذة وفرح.

  2. هذه المراحم التي يطلبها داود يستند فيها على وعود الله وأقواله له، بل هو ينتظر بركات من أقوال الله ووعوده، بركات تفوق العقل في الأبدية.

  3. تكمل رحمة الله المعزية في تجسد المسيح وفدائه، ويعطي مراحمه في كنيسته بالروح القدس.

 

ع(78-80): لِيَخْزَ الْمُتَكَبِّرُونَ لأَنَّهُمْ زُورًا افْتَرَوْا عَلَيَّ. أَمَّا أَنَا فَأُنَاجِي بِوَصَايَاكَ. لِيَرْجعْ إِلَيَّ مُتَّقُوكَ وَعَارِفُو شَهَادَاتِكَ. لِيَكُنْ قَلْبِي كَامِلًا فِي فَرَائِضِكَ لِكَيْلاَ أَخْزَى.

  1. قام المتكبرون وهم الشياطين وكل من يتبعهم من الأشرار، وأساءوا إلى داود البار باتهامات باطلة، وشهادات زور. أما هو فلم ينزعج من إساءاتهم، بل ظل ثابتًا في إيمانه، وأكثر من هذا انشغل بمناجاة الله وتسبيحه، مستخدمًا في مناجاته وصايا الله وكلماته. فانشغاله بالله أعطاه سلامًا، أما الأشرار فكانوا في اضطراب لأجل صنعهم الشر، وبالتالي إذ رأوا فرحة ومساندة الله له صاروا في خزي، لعلهم يتوبون، فالخزي ينبههم وينخسهم، فيشعرون ببطلان شرهم أمام قوة الله، ويرجعون إليه.

  2. يطلب داود من أجل الأتقياء الأبرار الذين ابتعدوا عنه عندما سقط في الزنا والقتل، ولكن إذ رأوه ثابتًا في إيمانه أثناء تأديب الله له، يرجعون إليه ويتشددون معه ويشجعونه، ويتشجعون في طريق الله؛ لأنهم رأوا عمل الله العجيب ومساندته لداود الخاضع للضيقة.

  3. يطلب أمرًا ثالثًا بعد أن طلب من أجل أعدائه والذين يتقون الله، فطلب لنفسه أن يصير كاملًا، أي يتنقى من كل خطية باستمراره في التوبة، ويزداد تمسكه بفرائض الله، أي عبادته. هكذا يكون في فخر وقوة بعيدًا عن كل خزي، فيواصل نموه الروحي.

قدر ما تقبل الضيقات يكشف لك الله عن أسراره، ويساندك، ويعمل فيك بقوة، فتختبر الله أكثر من أي وقت آخر، وتصير دون أن تشعر نورًا لكل من يراك.

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