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تفسير الكتاب المقدس - العهد القديم - الموسوعة الكنسية لتفسير العهد القديم: كنيسة مارمرقس بمصر الجديدة

مزمور 119 (118 في الأجبية) - قطعة ل - تفسير سفر المزامير

 

* تأملات في كتاب المزامير ل داؤود (مزامير داوود):
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القطعة الثانية عشر (ل)

كلمة الله ثابتة سماوية لا نهائية (ع 89-96):

الهدف:

بعد انتظار خلاص الله واحتمال مكايد الأشرار، يتمتع المؤمن بوصايا الله السماوية، والتي تصلح لكل جيل، ويطلبها ويرددها، ويفهمها، ويختبر اتساعها.

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ع89: إِلَى الأَبَدِ يَا رَبُّ كَلِمَتُكَ مُثَبَّتَةٌ فِي السَّمَاوَاتِ.

  1. إذ رأى داود مكايد الأشرار واضطرابهم ورفضهم كلام الله، نظر إلى السماء حيث الثبات. فالله ثابت، ومخلوقاته مثل السماء ثابتة، وكلامه أيضًا ثابت، يتمسك به كل الخلائق السماوية، أي الملائكة. وعلى قدر ما يتمسك الإنسان بوصايا الله يحتفظ بسلامه، وثباته، ويصير سماويًا، ومهيًا لسكنى الملكوت. وعلى العكس، فبرفض الأشرار كلام الله يكونون مضطربين، ويتباعدون عن الله ويسرعون، إلى نهايتهم المحتومة، وهي العذاب الأبدي.

  2. المسيح هو كلمة الله الثابت في السموات منذ الأزل وإلى الأبد، وتجسد في ملء الزمان ليفدينا، ولكنه أعد لنا مكانًا سماويًا، وينتظرنا لنرتفع إليه بعد حياتنا على الأرض، ونثبت فيه إلى الأبد.

  3. كلام الله ووعوده وإن كان يبدو بعيدًا كبعد السموات عن الأرض، ولكنه ثابت لا يمكن أن يتغير كما أعلن المسيح (مر 13: 31)، ولابد أن يتحقق ولو بعد حين. وانتظار وعود الله يرفع قلب الإنسان إلى السماء، فيسمو عن كل الشهوات الأرضية، ويحيا سماويًا نقيًا أمام الله.

 

ع90، 91: إِلَى دَوْرٍ فَدَوْرٍ أَمَانَتُكَ. أَسَّسْتَ الأَرْضَ فَثَبَتَتْ. عَلَى أَحْكَامِكَ ثَبَتَتِ الْيَوْمَ، لأَنَّ الْكُلَّ عَبِيدُكَ.

  1. الله الثابت ثبت أيضًا خلائقه، ليس فقط السموات، بل الأرض أيضًا بكل ظروفها من نهار وليل والفصول الأربعة. فكل الخلائق؛ سواء الشمس، أو الهواء، أو الأرض كلها عبيد لله، أي خاضعة له. وبالتالي يكون كلام الله ووعوده ثابتة.

  2. إن كانت أمانة الله ثابتة من دور إلى دور، فيقصد ثباته في عنايته ووصاياه لشعب اليهود قديمًا، ثم الدور الثاني، أو الجيل الثاني و هو كنيسة العهد الجديد، فوعوده ووصاياه للكنيسة ثابتة، وتظل أحكامه وكلامه ثابتة إلى الأبد في الأبدية.

وستجد تفاسير أخرى هنا في موقع الأنبا تكلا هيمانوت لمؤلفين آخرين.

 

ع92، 93: لَوْ لَمْ تَكُنْ شَرِيعَتُكَ لَذَّتِي، لَهَلَكْتُ حِينَئِذٍ فِي مَذَلَّتِي. إِلَى الدَّهْرِ لاَ أَنْسَى وَصَايَاكَ، لأَنَّكَ بِهَا أَحْيَيْتَنِي.

  1. يتذكر داود النبي أنه كان ساقطًا في الخطية التي سببت له الذل، ولكن عندما رجع إلى الله وأخذ يتلو كلامه تلذذ به؛ لأنه غفر له خطاياه، بل ومتعه بعشرته. فلهذا فهو يعد الله ألا ينسى كلامه إلى الدهر، أي طوال عمره؛ لأن كلام الله هو سر حياته.

  2. إن كان الشيطان يريد إسقاط المؤمن في الخطية، فالحماية من حروبه في تكرار وصايا الله وترديدها، والتلذذ بها، بهذا يحيا مع الله، ويكون محصنًا فيه، وبالتالي لا يترك وصايا الله طوال العمر؛ حتى أيضًا في الآبدية يظل يتمتع أيضًا بكلام الله، بل هناك تتجلى حلاوة كلام الله أكثر فأكثر.

 

ع94، 95: لَكَ أَنَا فَخَلِّصْنِي، لأَنِّي طَلَبْتُ وَصَايَاكَ. إِيَّايَ انْتَظَرَ الأَشْرَارُ لِيُهْلِكُونِي. بِشَهَادَاتِكَ أَفْطُنُ.

أفطن: افهم.

إذ تلذذ داود بكلام الله، وأخذ يتلو فيه دائمًا سلم حياته لله، فقال له" لك أنا فخلصني" لأني طلبت وصاياك، وأظل أطلبها طوال حياتي. ولهذا تعمل النعمة الإلهية فيه بقوة، وتحفظه وتحميه، مهما أحاط به الأشرار، وحاولوا إهلاكه، ولكنه تمسك بفهم وترديد شهادات الله ووصاياه.

 

ع96: لِكُلِّ كَمَال رَأَيْتُ حَدًّا، أَمَّا وَصِيَّتُكَ فَوَاسِعَةٌ جِدًّا.

  1. كل شيء يبدو قويًا أو كاملًا في العالم له نهاية، فداود رأى جليات الجبار الذي لا يستطيع أحد أن يقف أمامه يسقط بحصى من مقلاع، وأبشالوم قائد الجيش العظيم يموت معلقًا بشعره في شجرة. أما وصايا الله فليس لها نهاية، بل هي كنز كلما يقرأه يجد فيه معاني وأفكار جديدة، وليس هذا فقط أيام داود، بل حتى اليوم، فالإمبراطوريات تسقط، وكل قوة في العالم تنهار، أما كلام الله فغنى، ولا يستطيع أحد أن يدرك كل أعماقه. وكل كمالات العالم، أي الماديات التي يراها داود تامة وكاملة فهي أيضًا محدودة، أما كلمة الله فواسعة وليس لها حدود، لأنها مرتبطة بشخصه الإلهي غير المحدود.

  2. إن كلمة الله ومعرفته، وعقله هو الابن المتجسد في ملء الزمان، المسيح إلهنا، وهو غير محدود، أما كل كلام العالم، وكل شيء عظيم له حدود، والمسيح إلهنا فوق كل قوة في العالم، ويدوم إلى الأبد.

عندما تقرأ الكتاب المقدس كل يوم اطلب من الله أن يكشف لك عن أسراره فتفهم معاني جديدة مشبعة لنفسك؛ لتحيا بها، وهكذا تسمع صوت الله كرسالة شخصية لك كل يوم. وليتك تحفظ الآية التي أعجبتك لترددها دائمًا.

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